मध्य प्रदेश के किसी विश्वविद्यालय में कुलपति बनने से बेहतर है किसी होटल का मैनेजर बनना

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भोपाल, (डॉ. शैलेन्द्र सिंह)। मध्य प्रदेश के किसी विश्वविद्यालय में कुलपति बनने से बेहतर है किसी होटल का मैनेजर बनना। यह कथन है लेफ्टिनेंट जनरल (अवकाशप्राप्त) के टी सतारावाला का। इस कथन की पृष्ठभूमि यह है कि 1978 में सतारावाला को जबलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया था। इसी समय उन्हें भारत सरकार के पर्यटन विकास निगम के प्रबंध संचालक का पदभार ग्रहण करने का प्रस्ताव भी मिला था। सतारावाला ने प्रबंध संचालक का पद स्वीकार कर लिया और कुलपति का पद स्वीकार नहीं किया।

वर्ष 1978 में जनता पार्टी की सरकार में मध्य प्रदेश निवासी एवं रायपुर के सांसद पुरुषोत्तम कौशिक पर्यटन एवं नागरिक विमानन मंत्री थे। सतारावाला ने पदभार ग्रहण करने के बाद अपने विभाग के मंत्री से शिष्टाचार भेंट की। कौशिक ने जब उनसे कुलपति पद स्वीकार न करने का कारण पूछा तो सतारावाला ने बड़ी विनम्रता से व्यंगात्मक शैली में कहा, क्षमा कीजिए आप मध्य प्रदेश के हैं, लेकिन आपके राज्य में किसी विश्वविद्यालय का कुलपति बनने से बेहतर है होटल का मैनेजर बन जाना। पर्यटन विकास निगम की मुख्य गतिविधियों में निगम के होटलों का प्रबंधन और संचालन कार्य भी है। कौशिक को यह सुनकर शर्म आई और दु:ख भी हुआ, लेकिन तबसे आज तक मध्य प्रदेश की उच्च शिक्षा में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आया है और न ही सुधार लाने के कोई सार्थक प्रयास दिखाई देते हैं।

जनता पार्टी शासन में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सखलेचा से लेकर कांग्रेसी मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह तक सभी ने शिक्षा में सुधार लाने की जी तोड़ ईमानदार कोशिशें भले ही की हों, लेकिन राज्य की नौकरशाही और शिक्षा क्षेत्र के महंतों-मठाधीशों ने सभी कोशिशों को नाकाम कर दिया।दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश को भारत का ज्ञान केंद्र बनाने का सपना संजोया था। उनके प्रयासों से राज्य में मेडिकल एवं इंजीनियरिंग शिक्षा के क्षेत्र में कई निजी संस्थान खोले गए और ज़्यादा से ज़्यादा छात्रों को यह शिक्षा सुलभ कराई गई। निजी और सरकारी क्षेत्र में भारी-भरकम धनराशि खर्च करने के बाद शिक्षा में मात्रात्मक वृद्धि तो हुई, लेकिन गुणात्मक वृद्धि नहीं हो पाई।

भारतीय जनता पार्टी ने प्राचीन भारतीय संस्कृति का स़िर्फ गुणगान किया है, अतीत से कोई सबक नहीं सीखा। प्राचीन काल में मध्य प्रदेश शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। अयोध्या में जन्मे भगवान श्रीराम ने महर्षि विश्वामित्र के पास दंडकारण्य में शिक्षा पाई थी। द्वापर में श्रीकृष्ण मथुरा राज्य से उज्जैयनी ऋषि संदीपन के गुरुकुल में शिक्षा पाने आए थे। बौद्धकाल में भी सांची ज्ञान-विज्ञान का केंद्र था। ब्रिटिश शासनकाल में जबलपुर का नाम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विख्यात था। मध्य प्रदेश के विद्वानों-शिक्षाशास्त्रियों की भी प्रतिष्ठा थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के पहले कुलपति डॉ. सर हरिसिंह गौर थे, जिन्होंने बाद में अपनी संपूर्ण संपत्ति सागर विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु दान देकर एक प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र की स्थापना की। सागर विश्वविद्यालय का नाम एक अच्छे शिक्षा संस्थान के रूप में जाना जाता रहा है। इसमें देश भर के ख्यातिनाम विषय विशेषज्ञों को सम्मानजनक पदों पर नियुक्त किया गया था। एक समय था, जब जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र पढ़ाई खत्म होने से पहले ही देश और विदेशों में अच्छी नौकरी पा जाते थे, लेकिन आज मध्य प्रदेश की बदहाल और बर्बाद शिक्षा व्यवस्था अपने अतीत को याद कर केवल आंसू बहा रही है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने हाल ही में “यूनिवर्सिटी विद पोटेंशियल फॉर एक्सीलेंस स्कीम” के तहत महाकौशल क्षेत्र के एक भी कॉलेज को उत्कृष्ट नहीं माना है। पूरे राज्य में केवल चार सरकारी कॉलेजों को चुना गया है। इसके तहत आयोग प्रत्येक कॉलेज को अकादमिक उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए डेढ़ करोड़ रुपये का अनुदान देता है, लेकिन मध्य प्रदेश के लगभग 700 महाविद्यालयों में से केवल चार को ही आयोग ने इसके योग्य माना है।

शिक्षा की गुणवत्ता के बारे में इतना ही कहना पर्याप्त है कि पिछले पांच वर्षों में मध्य प्रदेश के किसी भी प्रोफेसर या उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सेवारत शिक्षक और शोधकर्ता का एक भी शोध-अनुसंधान अथवा उत्कृष्ट अध्ययन विषयक लेख किसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका और शोध ग्रंथ में प्रकाशित नहीं हुआ। देश-विदेश में ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न विषयों पर आयोजित उच्चस्तरीय कार्यशाला, संगोष्ठी या सम्मेलन में मध्य प्रदेश के किसी विद्वान को भाषण देने या शोधपत्र पढ़ने के लिए आमंत्रित नहीं किया गया है। राज्य में ऐसे कई कुलपति हो चुके हैं, जिन्हें आर्थिक अनियमितताओं, घोटालों, अनैतिकता, पक्षपात, और भाई-भतीजावाद के चलते पद से हटा दिया गया। इतना ही नहीं राज्य सरकार ने कुलपति पद को अपने चहेतों को उपकृत करने के लिए भी बदनाम किया। कई  प्रोफेसर और अधिकारी विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपति बने और बिना कुछ किए सुख-सुविधाएं भोगते रहे।

ऐसा नहीं है कि राज्य में विद्वानों एवं प्रतिभाओं की कमी है, पर राजनेता और अफसर इन स्थानीय प्रतिभाओं को उचित अवसर देने की ज़हमत नहीं उठाते। रीवा में एक बुज़ुर्ग कांग्रेस नेता विश्वविद्यालय और सरकारी महाविद्यालयों के अध्यापकों पर आतंक बने रहे, क्योंकि वह स्वयं निजी कॉलेज के संचालक थे और शिक्षा क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम किए हुए थे। अध्यापकों की पदस्थापना और ट्रांसफर-प्रमोशन आदि सभी मामलों में उनका और उनके चहेतों का सरकार पर दबाव बना रहता था। कई वर्ष पूर्व संस्कृत में पीएचडी के बाद उच्चस्तरीय शोध कर रहे एक व्याख्याता को शासन ने विश्वविद्यालय स्तर के शहर से हटाकर एक छोटे कस्बे में स्थानांतरित कर दिया। जब इस व्याख्याता ने अपनी स्थिति के बारे में आला अधिकारियों को बताया तो उन्होंने भी अनसुना कर दिया। अंत में तंग आकर इस व्याख्याता ने नौकरी छोड़ दी और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में नौकरी कर ली। यह व्याख्याता विश्वविद्यालय में डीन पद के अलावा संचालन समिति के सदस्य एवं विषय विशेषज्ञ के रूप में कार्य करते हुए सेवानिवृत्त हुआ और आज भी विश्वविद्यालय में अतिथि विद्वान के रूप में सेवा दे रहा है. इसके साथ ही यह विद्वान अमेरिका, जर्मनी एवं इंग्लैंड आदि देशों में प्रति वर्ष व्याख्यान के लिए बुलाया जाता है। अनेक नामचीन देशी-विदेशी संस्थानों से उन्हें कई सम्मान और पुरस्कार भी मिले हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में जब एक बार वह किसी काम से शिक्षा सचिव से मिलने आए और एक घंटे तक उन्हें सचिव के कक्ष के बाहर चपरासी के साथ बेंच पर बैठना पड़ा, तबसे उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार का नाम लेना ही छोड़ दिया। यही कहानी भूगर्भ विज्ञान के एक विद्वान प्रोफेसर की है। रीवा के सरकारी कॉलेज के इस प्रोफेसर का शोधपत्र लगभग 15 वर्ष पूर्व लंदन में अंतरराष्ट्रीय भू-विज्ञान कांग्रेस के वार्षिक सम्मेलन के लिए चुना गया था और उन्हें सम्मेलन में बुलाया गया था. जब आने-जाने के ़खर्च के लिए पीएफ एकाउंट से पैसा निकालने और लंदन जाने की अनुमति के लिए उन्होंने शासन से पत्र व्यवहार किया तो सम्मेलन संपन्न हो जाने के एक माह बाद शासन की अनुमति प्राप्त हुई। सेवानिवृत्ति के बाद यह प्रोफेसर भूगर्भ विज्ञान के कई देशी-विदेशी शोध छात्रों को मार्गदर्शन देने का काम कर रहे हैं और उन्हें मुंबई, चेन्नई एवं पुणे विश्वविद्यालयों में शोध कर रहे छात्रों के बीच व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता है। मध्य प्रदेश निवासी एक युवक एवं एक युवती अमेरिका के नासा में उच्च पद पर हैं, लेकिन अपने राज्य में उन्हें कॉलेज में व्याख्याता की नौकरी के क़ाबिल भी नहीं समझा गया। एक अन्य युवक अमेरिका की एक बड़ी आईटी कंपनी में वरिष्ठ पद एवं ऊंचे वेतन पर अपनी सेवाएं दे रहा है, जिसे सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में दैनिक वेतन पर भी व्याख्याता पद के लिए योग्य नहीं माना गया था, क्योंकि नौकरी देने वालों को अपने चहेतों को उपकृत करना था।

पीएचडी भी बिकती हैं

केवल राजनेता, नौकरशाह या कुलपति ही नहीं, बल्कि विभिन्न विश्वविद्यालयों और विभिन्न विषयों के प्रोफेसरों एवं शिक्षकों के निहित स्वार्थ भी शिक्षा की गुणवत्ता  बिगाड़ने के लिए उत्तरदायी हैं। पीएचडी के लिए चयन से लेकर उपाधि दिलाने तक की प्रक्रिया में शोध छात्रों का ज़बरदस्त शोषण-उत्पीड़न होता है। कुछ विषयों और कुछ प्रोफेसरों के बारे में तो प्रसिद्ध है कि इनके ज़रिए 50 हज़ार से लेकर एक लाख रुपये तक में पीएचडी दिला दी जाती है। योग्य शोध छात्रों को कड़ी मेहनत और उच्च स्तर के शोधकार्य के बाद भी सफलता नहीं मिलती। कई बार तो ऐसे छात्रों के आधे-अधूरे शोध कार्य प्रोफेसर किसी अन्य को बेच भी देते हैं। यही कारण है कि मध्य प्रदेश से कई हताश-निराश और प्रताड़ित प्रतिभाएं पलायन कर गईं हैं। भोपाल के एक निजी कॉलेज में वनस्पति विज्ञान की एक प्राध्यापक वर्षों तक प्रयास करने के बाद भी पीएचडी के लिए पंजीकरण नहीं करा पाईं, क्योंकि उनके मौलिक शोध कार्य को समझने वाला कोई था ही नहीं। औषधीय वनस्पतियों पर शोध कर रही एक बड़ी बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कंपनी ने जब महिला प्राध्यापक की परामर्श सेवा लेनी चाही तो सेवा नियमों के अनुशासन और स्वदेशी हितों के कारण उन्होंने असमर्थता जता दी। लेकिन जब उन्होंने स्वेच्छा से राज्य के जैव विविधता बोर्ड को अपनी सेवाएं देने की पेशकश की तो बोर्ड के अफसरों ने इतनी उपेक्षा से देखा कि महिला प्रोफेसर ने ज्ञान दान का पुण्य विचार ही त्याग दिया. ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं।

जवाब देने का काम बाबू के ज़िम्मे

मध्यप्रदेश में कुलपतियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारी फाइलों को दबाने में लगे रहते है और उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों को वर्षों तक टालते रहते हैं। जब न्यायालय द्वारा फटकार मिलती है और एडवोकेट जनरल या दिल्ली के सरकारी वकील बार-बार जवाब देने के लिए कहते हैं, तब विभाग के प्रमुख सचिव किसी बाबू को इस काम पर लगा देते हैं। अशासकीय महाविद्यालयों के शिक्षकों और कर्मचारियों को शासकीय कोषालय से पूरा वेतन देने का क़ानून 1978 में बना था, लेकिन दिग्विजय सिंह के शासन में कुछ आईएएस अफसरों ने सरकारी खर्च में बचत के लिए इन निजी कॉलेजों को अनुदान देने पर रोक लगाने की सलाह दी और एक क़ानून भी बना दिया. इस क़ानून को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और वहां राज्य सरकार मामला हार गई, लेकिन राज्य सरकार ने अपनी हार न मानते हुए उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर दी. लगभग दस सालों से मामला चल रहा है।सरकार बदल गई. कई मुख्यमंत्री, मंत्री और शिक्षा सचिव बदल चुके हैं. फिर भी मामले में सरकार की ओर से समाधान योग्य उत्तर सर्वोच्च न्यायालय में नहीं दिया गया। विभाग के एक बाबू को जवाब तैयार करने का ज़िम्मा सौंपा गया है और उसकी सहायता के लिए प्रतिनियुक्ति पर आए एक सरकारी कॉलेज के प्राध्यापक को लगाया गया है. महत्वपूर्ण सरकारी निर्णय बाबू कैसे ले सकता है?

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