चुनाव खत्म, क्या अब हम मुश्किलों में फंसी देश की अर्थव्यवस्था पर बात कर सकते हैं?

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चुनावी मौसम में आर्थिक खबरें उस तरह से हमारा ध्यान नहीं खींच पाती हैं. लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई सरकार की आमद और उसका धूम-धड़ाका शांत होते ही अब आर्थिक मोर्च पर मौजूद उन दिक्कतों की तरफ ध्यान दिया जा सकता है जिन्हें चुनावी राजनीति के चलते काफी समय से नजंरअंदाज किया जा रहा था.

चुनाव के बीच ही आए कई आंकड़े इस बात की चुगली करने लगे थे कि अर्थव्यवस्था की तबियत नासाज़ है. बिना रोजगार की आर्थिक वृद्धि की चर्चा काफी समय से चल रही थी. फिर खपत में आई गिरावट ने यह चिंता और बढ़ा दी. चुनावी गहमागहमी में ये आशंकायें ज्यादा ध्यान नहीं खींच पाईं. लेकिन अब चुनाव खत्म हो चुके हैं. नई सरकार के लिए यह वक्त संतुलित और कड़े फैसले लेने का है. इनमें से कुछ आम आदमी की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं.

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सबसे बुरी खबर यही है कि यह मंदी के दुष्चक्र में फंसती नजर आ रही है. एक विराट अर्थव्यवस्था में मंदी की आहट आम लोगों को कैसे प्रभावित करती है, कुछ आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं. उपभोक्ता वस्तुओं (एफएमसीजी) की मांग में इस साल के शुरुआती तीन महीनों में 13.6 फीसद की गिरावट आ चुकी है. जानकार मान रहे हैं कि गिरावट का यह सिलसिला और आगे भी जा सकता है. इसी तरह देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर से भी बिक्री घटने की खबरें आ रही हैं.

मतलब साफ है कि लोगों की क्रय शक्ति लगातार घट रही है. लेकिन साबुन, शैंपू और टूथपेस्ट जैसी दैनिक उपभोग की चीजों की मांग में आई कमी बताती है कि जमीन पर स्थिति काफी खराब है. शुरुआत में इसे ग्रामीण संकट कहा गया था, लेकिन अब नए आंकड़ों के मुताबिक खपत में यह कमी कस्बों और मध्यम दर्जे के शहरों तक पहुंच चुकी है. जानकार कहते हैं कि आटोमोबाइल की ब्रिकी में आई गिरावट को एक बारगी यह कहकर तर्कसंगत ठहराया जा सकता है कि यह सस्ते कर्ज के बाजार पर बहुत निर्भर करती है जो इस समय उपलब्ध नहीं है. लेकिन एफएमसीजी में गिरावट से साफ है कि लोगों के पास आय के साधन नहीं हैं और वे किसी तरह से अपने जीवन-स्तर में कटौती कर जीवन-यापन कर रहे हैं.

सवाल है कि नई मोदी सरकार ऐसा क्या कर सकती है कि एकाएक देश में खपत बढ़ जाए? मूलभूत अर्थशास्त्र के पास इसका सीधा उत्तर है कि सरकार लोगों को रोजगार दे और उनकी आय बढ़ाए. लेकिन, मोदी सरकार का ट्रैक रिकार्ड इस मामले में अच्छा नहीं रहा है. बल्कि खपत के घटने की एक वजह भारी बेरोजगारी भी है. नई सरकार के पास ऐसा कोई जादू नहीं दिखता है कि वह एकाएक रोजगार बढ़ा देगी. ऐसे में वह क्या करेगी, यह देखने वाली बात होगी, लेकिन खपत में आई कमी के कारण कई आटोमोबाइल और एफएमसीजी( उपभोक्ता वस्तुओं) कंपनियों ने अपने भविष्य की निवेश योजनाओं में कटौती शुरु कर दी है. कुछ कंपनियों ने उत्पादन घटाने की बात भी कही है. यानी कि आने वाले समय में रोजगार के कुछ नए मौकों पर विराम लग सकता है और कुछ लोगों की नौकरियां जा सकती हैं.

मंदी के हालात हैं, यह बात केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय ने भी अपनी मासिक रिपोर्ट में मानी है. उसने इसकी वजह निजी निवेश में कमी बताई है. लेकिन, जानकार कहते हैं कि निजी निवेश तभी बढ़ता है जब देश में खपत बढ़ती है. अगर इसे दूसरी तरह से देखें तो भारतीय जीडीपी में उपभोक्ता खपत की हिस्सेदारी लगभग 60 फीसद है. इससे साफ है कि खपत ही हमारी आर्थिक वृद्धि के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है.

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