गुना लोकसभा सीट : यहां मुद्दे या दल नहीं, सिर्फ ‘महल’ फैक्टर चलता है

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ग्वालियर। एमपी में आज यूं तो 8 लोकसभा सीटों पर चुनाव हो रहा है, लेकिन गुना सीट पर चुनाव कई मायनों में अहम है. मैदान में कांग्रेस की ओर से ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं तो वहीं बीजेपी की ओर से किसी जमाने में सिंधिया के ही सांसद प्रतिनिधि रहे केपी यादव हैं. इस सीट पर सीधे सिंधिया घराने का फैक्टर ही काम करता है.

2014 की मोदी लहर में भी एमपी की जिन दो सीटों पर बीजेपी अपना परचम नहीं फहरा पायी, उनमें से एक गुना सीट थी. सिंधिया का गढ़ कही जाने वाली गुना-शिवपुरी सीट पर इस बार एक तरफ मैदान में हैं कांग्रेस के मौजूदा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया तो उनके मुकाबले में हैं कांग्रेस से बीजेपी में आए किसी जमाने में सिंधिया के सांसद प्रतिनिधि रहे के पी यादव. बीजेपी की ओर से गुना सीट को लेकर जोर आज़माइश भले कितनी भी की जाए लेकिन सियासी समीकरण बताते हैं कि गुना के किले पर इस बार भी परचम फहराना बीजेपी के लिए आसान नहीं है.

गुना सीट के सबसे बड़े मुकाबले पर नजर डालें तो कांग्रेस की ओर से ज्योतिरादित्य सिंधिया मैदान में हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया मौजूदा वक्त में गुना सीट से कांग्रेस के सांसद हैं. सिंधिया को गुना सीट से लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हुए 17 साल हो चुके हैं. सिंधिया पहली बार 2002 में गुना सीट से सांसद चुने गए थे.

2018 विधानसभा चुनाव से पहले हुए उपचुनाव में के पी यादव ने बीजेपी का दामन थाम लिया था. गुना सीट का इतिहास इस बात का गवाह है कि ये सीट सिंधिया खानदान की गढ़ रही है. फिर वो चाहे सिंधिया परिवार का कोई सदस्य बीजेपी से खड़ा हुआ हो या कांग्रेस से.

1957 में हुए लोकसभा चुनाव में इस सीट से राजमाता विजयराजे सिंधिया ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की थी.
1971 में माधव राव सिंधिया ने भारतीय जनसंघ के टिकट पर चुनाव जीता था
हालांकि 1977 में माधव राव सिंधिया निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते.

1980 तक कांग्रेस में शामिल हो चुके माधव राव सिंधिया फिर चुनाव लड़े और जीते.
1989 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया बीजेपी के टिकट पर फिर चुनाव लड़ीं और जीत दर्ज की.
इसके बाद राजमाता का चुनाव जीतने का ये सिलसिला 1998 तक जारी रहा.
2002 से इस सीट से कांग्रेस के टिकट पर ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार सांसद हैं.

गुना-संसदीय सीट पर चुनावी इतिहास की बात करें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार ज्योतिरादित्य सिंधिया को 5,17,036 वोट मिले थे जबकि उनके मुकाबले में मैदान में खड़े बीजेपी के उम्मीदवार जयभान सिंह पवैया को 396244 वोट मिले थे. सिंधिया को कुल वोट का 52.89 फीसदी जबकि पवैया को 44.53 फीसदी मिला.

गुना-शिवपुरी लोकसभा क्षेत्र में 8 विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें से दो गुना और बमोरी गुना जिले की हैं जबकि 3 सीटें शिवपुरी जिले की शिवपुरी, कोलारस, पिछोर हैं और अशोनगर जिले की 3 सीटें अशोकनगर, चंदेरी और मुंगावली हैं.

विधानसभा चुनाव में गुना की 2 सीटों में से 1-1 पर बीजेपी काबिज है. जबकि अशोकनगर की 3 सीटों में से सभी 3 कांग्रेस को मिलीं. यहां बीजेपी को एक सीट का नुकसान हुआ. शिवपुरी में 3 सीटों में से 2 बीजेपी और एक कांग्रेस के पास है. यहां कांग्रेस को एक सीट का नुकसान हुआ.

गुना संसदीय क्षेत्र में करीब 16.62 लाख मतदाता हैं. इनमें 8.82 पुरुष जबकि 7.80 महिला मतदाता हैं.जातिगत समीकरण के मुताबिक अनुसूचित जनजाति की तादाद सबसे ज्यादा 2 लाख 30 हजार से ज्यादा है.अनुसूचित जाति – 1 लाख से ज्यादा, कुशवाह – 60 हज़ार, रघुवंशी – 32 हजार, यादव – 73 हज़ार, ब्राह्मण – 80 हज़ार, मुस्लिम – 20 हज़ार, वैश्य जैन – 20 हजार सबसे ज्यादा असर अनुसूचित जाति का है लेकिन ब्राह्मण वोट बैंक भी बाज़ी पलटने में असरदार साबित होता है.

अगर मुद्दों की बात की जाए तो बिजली, पानी, सड़क और रोजगार गुना के सबसे बड़े मुद्दे हैं. गुना सीट पर चुनावी लड़ाई भले सिंधिया के लिए थोड़ी आसान लगती हो लेकिन जीत की खातिर सियासी दांव पेंच फिर भी कम नहीं हैं. चुनाव प्रचार के दौरान बीएसपी उम्मीदवार लोकेंद्र सिंह का सिंधिया के पक्ष में सरेंडर करना इसका उदाहरण है. देखना ये होगा कि क्या बीजेपी सिंधिया के किले में सेंध लगा पाएगी या सिंधिया का गढ़ बरकरार रहेगा.

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