Kumbh Mela 2019: मुक्ति के इस मार्ग को प्रशस्त कर अमृतत्व प्रदान करता है ‘कुम्भ पर्व’

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प्रयागराज। धर्मशास्त्रों के अनुसार अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष इन चारों दिव्य पुरुषार्थों को प्राप्त करना ही मानव जीवन का उद्देश्य है। जन्म और मृत्यु के चौरासी लाख चक्रों को पार करने के बाद दुर्लभ मानव शरीर प्राप्त होता है ताकि मनुष्य योनि में प्रभु की भक्ति कर मोक्ष पाकर जन्म और मरण के चक्र से मुक्ति मिल सके और मुक्ति के इस मार्ग को प्रशस्त कर अमृतत्व प्रदान करता है ‘कुम्भ पर्व’। ‘कुम्भ पर्व’ का आयोजन अनादिकाल से होता चला आ रहा है, जो केवल भारतवर्ष का ही नहीं अपितु पूरे विश्व के जनमानस की एकता, मानवता एवं आस्था का संगम है।

ग्रह नक्षत्रम् ज्योतिष शोध संस्थान के ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार भारतीय संस्कृति में जन्म से मृत्यु तक के सभी शुभाशुभ संस्कारों में कुम्भ (कलश) को स्थापित करने के पश्चात् ही देव पूजन कर्म करने का विधान है। कलश या घट कुम्भ का पर्याय है, कुम्भ एक राशि भी है। कुम्भ का आध्यात्मिक अर्थ है ज्ञान का संचय करना, ज्ञान की प्राप्ति प्रकाश से होती है और कुम्भ स्नान, दर्शन, पूजन से आत्म तत्व का बोध होता है। हमारे अन्दर ब्रह्माण्ड की समस्त रचना व्यापत है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ‘यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे, तत् ब्रह्माण्डे, यत् पिण्डे’, अर्थात् जो मानव पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड है और जो ब्रह्माण्ड में है, वही मानव पिण्ड में है।

कुम्भ, ‘घट’ का सूचक है और घट शरीर का, जिसमें घट-घट व्यापी आत्मा का अमृत रस व्याप्त रहता है। यह मानव पिण्ड में निहित प्रतीकों में इसलिए व्याप्त है, जिसमें संत दर्शन, देव दर्शन आदि के माध्यम से मनुष्य अन्तर्मुखी होकर चिन्तन कर सके एवं समझ सके। ‘कुम्भ पर्व’ में जिस ऐतिहासिक कुम्भ का स्मरण किया जाता है वह अमृत कुम्भ सुधाकलश है जिसके लिए वैदिक काल में प्रसिद्ध देवासुर संग्राम हुआ था। समुन्द्र मन्थन से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक अमृत कुम्भ था। इसी को प्राप्त करने के लिए देवताओं व असुरों में देवासुर संग्राम हुआ था।

माना जाता है कि समुंद्र मंथन से जो अमृत कलश निकला था उस कलश से देवता और राक्षसों के युद्ध के दौरान धरती पर अमृत छलक गया था। जहां-जहां अमृत की बूंद गिरी वहां प्रत्येक बारह वर्षों में एक बार कुंभ का आयोजन किया जाता है। उन चौदह रत्नों में अमृत कुम्भ ही सर्वोपरि महत्व की वस्तु थी, अतः उसी की स्मृति ‘कुम्भ पर्व’ के रूप में सुरक्षित चली आ रही है। हिंदू धर्मग्रंथ के अनुसार इंद्र के बेटे जयंत के घड़े से अमृत की बूंदे भारत में चार जगहों पर गिरी, हरिद्वार में गंगा नदी में, उज्जैन में शिप्रा नदी में, नासिक में गोदावरी और प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल पर। धार्मिक विश्वास के अनुसार कुंभ में श्रद्धापूर्वक स्नान करने वाले लोगों के सभी पाप कट जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार कुंभ पर्व और ग्रह-नक्षत्रों का आपस में गहरा संबंध है, बिना ग्रह नक्षत्रों के तालमेल के कुम्भ पर्व की गणना असम्भव है क्योंकि कुंभ महापर्व तभी आयोजित होता है जब ग्रहों की वैसी ही स्थिति निर्मित हो रही हो जैसी अमृत छलकने के दौरान हुई थी। जब देवासुर संग्राम हुआ था, उस समय जो नक्षत्र तथा लग्न व राशि थी, जो ग्रहों का संयोग था, पुनः वे सब जब उसी तरह एकत्रित होते हैं अर्थात् वही नक्षत्र, वही ग्रह और वही राशियां जब फिर से जुड़ते हैं तो वही काल उपस्थित हो जाता है।

शास्त्रों के अनुसार चन्द्रमा ने अमृत कलश पर ढक्कन का कार्य किया और उसे छलकने से रोका था, अमृत कलश को फूटने से बचाने का कार्य सूर्यदेव ने किया। देवगुरु बृहस्पति ने अपने मंत्रों के प्रभाव से असुरों को उससे दूर रखा अर्थात् राक्षसों से उसकी रक्षा की। अतः जिस दिन, जिस वर्ष व जिस महीने में सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति ग्रह संयोग करते हैं, उसी वर्ष उसी राशि के योग में जहां-जहां अमृत बूंद गिरी थी, उस समय प्रयाग, हरिद्वार, नासिक अथवा उज्जैन में कुम्भ पर्व का योग बनता है। कुम्भ के माहात्म्य को जितना भी कहा जाए वह कम है,‘‘अश्वमेध सहस्त्राणि वाजपेय शतानि च। लक्ष प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भस्नानेन तत्फलं।।’’ अर्थात् एक हजार अश्वमेध यज्ञ, एक सौ वाजपेय यज्ञ एवं एक लाख पृथ्वी की परिक्रमा करने का जो फल प्राप्त होता है वही फल मनुष्य को ‘कुम्भ स्नान’ से मिलता है।

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