OPINION: भाजपा को फिर करिश्मे की उम्मीद, कांग्रेस को दिग्गजों से आस

अब वक्त मैदानी लड़ाई का है. मध्यप्रदेश को सियासी गरमी छाने इंतजार का है. हार का झटका खाई भाजपा यहां अभी उभर नहीं पाई है, सत्तासीन हुई कांग्रेस ने अब यहां जमीन से ज्यादा चैंबर पॉलिटिक्स पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं. 29 अप्रैल से 21 दिन 19 मई तक यहां कुल चार चरणों में वोटिंग की तारीखें तय हो गई हैं. प्रदेश की 29 सीटें दिल्ली की तख्त के लिए क्या मायने रखती हैं, इसका हिसाब 2014 में देखा जा चुका है जब मोदी लहर में एक तरफा 27 सीटें भाजपा ने हथिया कर कांग्रेस को केंद्र की राजनीति में 50 का आंकडा भी पार नहीं करने दिया था. प्रदेश में 5 करोड़ से ज्यादा वोटर्स हैं.

भाजपा के वोट बैंक में लगी 13 फीसदी की सेंध 

अब हालात बदल चुके हैं. खास तौर पर भाजपा के लिए जिसने 2014 के मुकाबले 13 फीसदी से ज्यादा वोटर्स खो दिए हैं. इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने 6 फीसदी वोट को भाजपा से हथियाकर प्रदेश में अपनी सरकार बनी ली है. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा का दांव यूं तो बराबरी पर बैठा है. आधा फीसदी वोट भाजपा का ही ज्यादा है. बावजूद इसके कांग्रेस का सत्ता में आना 2019 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा फैक्टर है. 2014 में 27 सीटों पर जीत दर्ज कर करिश्मा करने वाली भाजपा अब एअर स्ट्राइक बाद हवा में जोश और वोटरों में उन्माद पैदा कर रही है. लेकिन उसके लिए यह चमत्कार दोहराना इतना आसान नहीं है.

कांग्रेस में दमदार जीत के लिए जहां मुख्यमंत्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अजय सिंह, कांतिलाल भूरिया पर दारोमदार है, वहीं बीजेपी में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्पीकर सुमित्रा महाजन समेत नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्तम मिश्रा के अलावा फग्गन सिंह कुलस्ते जैसे आदिवासी नेताओं पर नजरें लगी हुई हैं.

कमलनाथ, तन्खा तय करेंगे जीत
पहला चरण- 29 अप्रैल – सीधी, शहडोल, मंडला, जबलपुर, बालाघाट, छिंदवाड़ा सीट पर वोटिंग होगी. यह मुख्यमंत्री कमलनाथ के प्रभाव वाला का इलाका है. छिंदवाड़ा प्रतिष्ठित सीट जिसे मोदी लहर में भी भाजपा नहीं हथिया पाई ,इस बार दिलचस्प हो गई है क्योंकि मुख्यमंत्री बनने के बाद कमलनाथ के इसे छोड़कर यहां से अपने बेटे नकुलनाथ को चुनाव मैदान में उतारने की चर्चा है. भाजपा भी यहां किसी दमदार नेता के नाम पर शिवराज सिंह का नाम आगे कर सकती है. जबलपुर से पिछला चुनाव कांग्रेस के दिग्गज नेता विवेक तन्खा बुरी तरह हार चुके हैं. सीधी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह के प्रभाव का इलाका है लेकिन उनके बेटे अजय सिंह का विधानसभा चुनाव हारना बड़ा झटका है. इन छह सीटों पर आदिवासी वोट का प्रभाव है. जिसमें कांग्रेस सेंध लगा चुकी है.

उमा भारती, अजय सिंह का इलाका
दूसरा चरण- 6 मई- टीकमगढ़, दमोह, खजुराहो, सतना, रीवा, होशंगाबाद, बैतूल कुल सात सीटों पर मतदान होगा. इनमें से दो सीटें रिजर्व हैं. बाकी सीटों पर कांग्रेस नेता अजय सिंह और सुरेश पचौरी की प्रतिष्ठा दांव पर है. दोनों ही नेता विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं. लोकसभा में फिर से मैदान में उतरने की चर्चा है. टीकमगढ़, खजुराहो, दमोह भाजपा नेता उमा भारती के प्रभाव का इलाका है. हालांकि वे प्रदेश की राजनीति से बाहर हैं, यहां कांग्रेस अपनी विरासत को फिर से पाने के लिए भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए रामकृष्ण कुसुमारिया पर दांव चल सकती है.

सिंधिया –दिग्विजय पर दारोमदार
तीसरा चरण- 12 मई- मुरैना, भिंड, ग्वालियर, गुना, सागर, विदिशा, भोपाल, राजगढ़ की आठ सीटों पर वोटिंग होगी. भिंड एससी की आरक्षित सीट है, जिस पर पिछले चुनाव में कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए आइएएस अधिकारी डा. भागीरथ प्रसाद ने जबरदस्त जीत हासिल की थी. ग्वालियर चंबल का यह इलाका सिंधिया रिसायस के प्रभाव वाला है. ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना सीट से तो उनकी पत्नी प्रियदर्शिनी के ग्वालियर से मैदान में उतरने की संभावना है. एससी एसटी एक्ट के बाद आंदोलन की चपेट मे आया यह इलाका भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव में मुश्किल पैदा कर चुका है. विदिशा पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज का गृह नगर है. वे यहां से लगातार पांच बार सांसद रहें. सुषमा स्वराज को चुनाव यहीं से लड़वाया गया था. स्वराज के चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा के बाद शिवराज यहां से पत्नी साधना सिंह को मैदान में उतार सकते हैं या फिर खुद भी चुनाव लड़ सकते हैं. राजगढ़ की सीट पर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का दबदबा है. यहां से उनके चुनाव लड़ने की संभावना है.

भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान यहीं से
19 मई को आखिरी चरण- देवास, उज्जैन, मंदसौर, रतलाम, धार, इंदौर, खरगोन, खंडवा में वोटिंग होगी.
विधानसभा चुनाव में सबसे तगड़ा झटका यहीं से भाजपा ने खाया है. इनमें से पांच सीट्स एससी/ एसटी वर्ग की आरक्षित हैं. मंदसौर किसान आंदोलन का वह प्रतिमान है जिसे खड़ा कर कांग्रेस ने यहां सत्ता वापसी की. सबसे आखिरी चरण में यहां होने वाली वोटिंग का क्या फायदा अब यहां से भाजपा को मिलता है यह तो वक्त ही बताएगा,  क्योंकि पिछले चुनाव में जयस पार्टी का यूथ और एससी एसटी एक्ट के बाद पैदा हुए सवर्ण आंदोलन ने चुनाव की दिशा बदल दी थी.