युद्ध के मुहाने पर अमेरिका और ईरान, दोनों से संतुलन बनाना भारत के लिए है बड़ी चुनौती

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नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव उस समय ज्यादा बढ़ गया, जब ओमान की खाड़ी में तेल टैंकरों पर संदिग्ध हमले हुए। वाशिंगटन ने इस हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया और ईरान ने इस हमले में किसी भी तरह से शामिल होने से इनकार कर दिया। इसी घटना को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा। अमेरिकी नौसेना ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य के पास एक जापानी तेल टैंकर पर हमले में जिस विस्फोटक का इस्तेमाल किया गया, वह ईरान के विस्फोटकों से काफी मेल खाता है। वहीं, ईरान अमेरिकी नौसेना के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि वाशिंगटन ने जो साक्ष्य पेश किए हैं, वह अप्रमाणित हैं।

युद्ध के हालात में रूस और चीन देंगे ईरान का साथ!
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की स्थिति बनने पर रूस और चीन जैसे देश जाहिर तौर पर ईरान के समर्थन में आ जाएंगे और उधर अमेरिका के साथ नाटो देश खड़े होंगे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने तो अमेरिका को चेतावनी देते हुए यहां तक कह दिया कि ईरान पर हमले का परिणाम बहुत विनाशकारी होगा। रुसी राष्ट्रपति का कहना बिल्कुल सही है, क्योंकि इससे न केवल बड़े पैमाने पर जान माल का नुकसान होगा बल्कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। खासकरके, कच्चे तेल की कीमतें तो आसमान पर पहुंच जाएंगी। इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

अपनी जरूरतों का 27 प्रतिशत तेल ईरान से आयात करता है भारत 
भारत अपनी कुल तेल खपत का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। भारत को सबसे ज्यादा कच्चा तेल निर्यात करने वाले देशों की सूची में ईरान तीसरे स्थान पर है। ईरान से भारत अपनी जरूरतों का 27 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। उधर, ईरान ने कहा है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद वह भारत से अनाज, दवाओं और अन्य उत्पादों का आयात बढ़ाएगा और डॉलर से बचने के लिए दोनों देश आपसी मुद्रा में ही लेन-देन करेंगे।

भारत-ईरान के व्यापारिक रिश्त काफी अहम
इससे भारत के लिए ईरान की अहमियत को समझा जा सकता है। भारत को तेल खरीद पर ईरान 60 दिन का क्रेडिट भी देता है, जो दुनिया का कोई देश नहीं देता। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि भारत तेल के बदले में ईरान को रुपये की जगह चावल या कोई अन्य चीज दे देता है। साथ ही ईरान से तेल निर्यात करने के टर्म्स भी बहुत सुलझे हुए हैं। यही सब बातें भारत और ईरान के बीच प्रगाढ़ संबंधों के बेहतरीन सुबूत हैं।

भारत-ईरान के बीच रणनीतिक साझेदारी भी है अहम
तेहरान और दिल्ली के बीच केवल व्यापक सम्बन्ध ही नहीं हैं, बल्कि महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारी भी है। चीन द्वारा पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में ओबीओबी (वन बेल्ट, वन रोड) के तहत ग्वादर पोर्ट विकसित किये जाने से उसकी पहुंच अरब सागर में प्रत्यक्ष रूप से हो जाएगी, इससे  रणनीतिक रूप से भारत को घाटा होगा। इस खतरे से निपटने के लिए भारत ने ईरान के सिसटन और बलूचिस्तान स्थित चाबहार में भारी निवेश करके एक पोर्ट विकसित किया है जो ग्वादर पोर्ट से महज 72 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां से भारत चीन की हरकतों पर नज़र रख सकता है।

अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध की स्थिति में भारत होगा किसके साथ? 
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ा तो वह किसके साथ खड़ा होगा? एक तरफ ईरान है और दूसरी तरफ अमेरिका। ईरान के साथ भारत के रिश्ते ऐतिहासिक होने के साथ-साथ कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता भी है। अमेरिकी प्रतिबंध के बाद ईरान से तेल नहीं खरीदने की स्थिति में कच्चे तेल के आयात को सऊदी अरब और युएई से पूरी की जा सकती है, लेकिन ईरान तेल के निर्यात के साथ-साथ ढुलाई का पूरा खर्च उठाता और हमारे पोर्ट तक तेल पहुंचाने की पूरी जिम्मेदारी ईरान की होती है। इसके अलावा भुगतान करने के लिए 60 दिन तक की क्रेडिट भी देता है। दूसरी ओर अमेरिका है जिससे भारत का व्यापारिक और रणनीतिक हित जुड़ा हुआ है। अब यह पूरी तरह से भारत की विदेश नीति, रक्षा नीति और व्यापारिक संबंधों पर है कि वह किसके साथ खड़ा होता है?

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