जब तक कानून वापसी नहीं, घर वापसी नहीं : 8वें दौर की वार्ता में किसानों की केंद्र को दो टूक, अगली बैठक 15 को

नई दिल्ली। सरकार के साथ किसानों की 9वें दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही। 44 दिन से दिल्ली के दरवाजे पर आंदोलन कर रहे किसानों ने बैठक में तल्ख रुख अपनाया। बैठक में किसान नेताओं ने पोस्टर भी लगाए, जिन पर गुरुमुखी में लिखा था- मरेंगे या जीतेंगे। बैठक के बाद भी किसानों के तल्ख तेवर कायम रहे। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने भी माना, ‘50% मुद्दों पर मामला अटका हुआ है। इसलिए अगली बैठक 15 जनवरी को करने का फैसला लिया है।’

बैठक में किसानों का रुख कैसा रहा, 4 पॉइंट्स में समझिए
1. सरकार से कहा- लोगों की बात कम सुनी जाती है

आप जिद पर अड़े हैं। आप अपने-अपने सेक्रेटरी, जॉइंट सेक्रेटरी को लगा देंगे। वे कोई न कोई लॉजिक देते रहेंगे। हमारे पास भी लिस्ट है। फिर भी आपका फैसला है, क्योंकि आप सरकार हैं। लोगों की बात शायद कम सुनी जाती है। जिसके पास ताकत है, उसकी बात ज्यादा होती है। इतने दिनों से बार-बार इतनी चर्चा हो रही है। ऐसा लगता है कि इस बात को निपटाने का आपका मन नहीं है। तो वक्त क्यों बर्बाद करना? आप साफ-साफ जवाब लिखकर दे दीजिए, हम चले जाएंगे। – बलबीर सिंह राजेवाल, भारतीय किसान यूनियन के नेता

2. हम किसी कोर्ट में नहीं जाएंगे
बैठक का माहौल गर्म था। हमने कह दिया है कि कानून वापसी के अलावा कुछ भी मंजूर नहीं है। हम किसी कोर्ट में नहीं जाएंगे। कानून वापस लो, नहीं तो हमारी लड़ाई चलती रहेगी। लड़ेंगे, नहीं तो मरेंगे। योजना के मुताबिक, 26 जनवरी की परेड भी निकालेंगे। – हन्नान मुल्ला, ऑल इंडिया किसान सभा के जनरल सेक्रेटरी

3. सरकार ने हमारी और हमने सरकार की बात नहीं मानी
तारीख पर तारीख चल रही है। बैठक में सभी किसान नेताओं ने एक आवाज में बिल रद्द करने की मांग की। हम चाहते हैं बिल वापस हो, लेकिन सरकार चाहती है कि संशोधन हो। सरकार ने हमारी बात नहीं मानी, तो हमने भी सरकार की बात नहीं मानी। – राकेश टिकैत, भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता

4. कानून वापसी, तभी घर वापसी
बैठक के दौरान कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कृषि कानूनों को वापस लेने की किसानों की मांग को एक बार फिर ठुकरा दिया। इस पर किसान नेताओं ने कहा, ‘हम राजनीतिक दल नहीं हैं। कानून वापसी करें, तभी घर वापसी होगी।’ हालांकि, कृषि मंत्री उन्हें समझाते रहे कि लोकतंत्र में हर समस्या का समाधान चर्चा से होता है।

सरकार को भी कैसे रास्ता नहीं सूझ रहा, 2 पॉइंट्स से समझिए
1. किसानों से ही विकल्प मांग रही सरकार

9वें दौर की बातचीत के बाद कृषि मंत्री मीडिया के सामने आए। उन्होंने कहा, ‘कानूनों पर चर्चा की कोशिश की गई, पर कोई फैसला नहीं हो पाया। हमने किसानों से कहा कि वे कानून वापसी के अलावा कोई विकल्प हमें दें तो हम विचार को तैयार हैं, लेकिन हमें कोई विकल्प नहीं दिया गया।’

2. कानूनों का समर्थन कर रहे किसानों को शामिल करने में भी हिचक
सरकार अभी किसानों को और नाराज नहीं करना चाहती। कृषि मंत्री से पूछा गया कि क्या वे कृषि कानूनों का समर्थन कर रहे किसान संगठनों को भी अगली बैठक में शामिल करेंगे? इस पर उन्होंने कहा, ‘अभी ऐसा कोई विचार नहीं है। अभी हम आंदोलन कर रहे पक्ष से बात कर रहे हैं। जरूरत पड़ी, तो दूसरे पक्ष पर विचार करेंगे।’

4 मुद्दों पर मतभेद थे, 2 पर बात अटकी
किसानों के 4 बड़े मुद्दे हैं-

  • पहला– सरकार कृषि कानूनों को वापस ले।
  • दूसरा– सरकार यह लीगल गारंटी दे कि वह मिनिमम सपोर्ट प्राइस यानी MSP जारी रखेगी।
  • तीसरा– बिजली विधेयक वापस लिया जाएगा।
  • चौथा– पराली जलाने पर सजा का प्रावधान वापस लिया जाए।
  • बिजली विधेयक और पराली के मुद्दे पर सरकार 7वें दौर की बातचीत में ही किसानों को भरोसा दे चुकी है, लेकिन MSP और कृषि कानूनों को वापस लेने की किसानों की मांग पर गतिरोध बना हुआ है।

क्या डेरा नानकसर से अब नया रास्ता निकलेगा?
डेरा नानकसर के मुखी बाबा लक्खा सिंह ने कृषि मंत्री तोमर से गुरुवार को एक मीडिएटर के तौर पर मुलाकात की। सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय मंत्री ने बाबा लक्खा सिंह को बताया कि सरकार अब एक प्रस्ताव तैयार कर रही है, जिसमें राज्य सरकारों को कृषि कानून लागू करने या न करने की छूट दी जाएगी। डेरा नानकसर भी किसान आंदोलन में शामिल है।

बाबा लक्खा सिंह ने बताया, ‘करीब पौने दो घंटे हुई चर्चा में मैंने कृषि मंत्री से सवाल पूछा कि आप की बात किसी नतीजे पर खत्म नहीं होती तो क्या उन राज्यों को कानूनों से बाहर रख सकते हैं, जिनमें काफी विरोध है। इस पर तोमर ने सहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर किसानों से बात करने को तैयार हैं। जो राज्य कानून को लागू करना चाहें, वे करें और जो नहीं चाहते वे नहीं करें।’

कृषि मंत्री बोले- राज्यों पर फैसला छोड़ने का प्रस्ताव नहीं आया
कृषि मंत्री ने कहा कि शुक्रवार की बैठक में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया। ऐसा प्रस्ताव किसान यूनियन की तरफ से आना चाहिए। हमने किसी को सीधा अप्रोच नहीं किया है। बाबा लक्खा सिंह के मन में दर्द था कि किसान आंदोलन कर रहे हैं, इसलिए समाधान निकलना चाहिए। हमारे बीच बातचीत हुई। हमने कानूनी पक्ष उन्हें बताया।

पिछली 8 में से सिर्फ 1 बैठक का नतीजा निकला

पहला दौरः 14 अक्टूबर
क्या हुआः मीटिंग में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की जगह कृषि सचिव आए। किसान संगठनों ने मीटिंग का बायकॉट कर दिया। वो कृषि मंत्री से ही बात करना चाहते थे।

दूसरा दौरः 13 नवंबर
क्या हुआः कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल ने किसान संगठनों के साथ मीटिंग की। 7 घंटे तक बातचीत चली, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला।

तीसरा दौरः 1 दिसंबर
क्या हुआः तीन घंटे बात हुई। सरकार ने एक्सपर्ट कमेटी बनाने का सुझाव दिया, लेकिन किसान संगठन तीनों कानून रद्द करने की मांग पर ही अड़े रहे।

चौथा दौरः 3 दिसंबर
क्या हुआः साढ़े 7 घंटे तक बातचीत चली। सरकार ने वादा किया कि MSP से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। किसानों का कहना था सरकार MSP पर गारंटी देने के साथ-साथ तीनों कानून भी रद्द करे।

5वां दौरः 5 दिसंबर
क्या हुआः सरकार MSP पर लिखित गारंटी देने को तैयार हुई, लेकिन किसानों ने साफ कहा कि कानून रद्द करने पर सरकार हां या न में जवाब दे।

6वां दौरः 8 दिसंबर
क्या हुआः भारत बंद के दिन ही गृह मंत्री अमित शाह ने बैठक की। अगले दिन सरकार ने 22 पेज का प्रस्ताव दिया, लेकिन किसान संगठनों ने इसे ठुकरा दिया।

7वां दौर: 30 दिसंबर
क्या हुआ: नरेंद्र सिंह तोमर और पीयूष गोयल ने किसान संगठनों के 40 प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। दो मुद्दों पर मतभेद कायम, लेकिन दो पर रजामंदी बनी।

8वां दौर: 4 जनवरी
क्या हुआ: 4 घंटे चली बैठक में किसान कानून वापसी की मांग पर अड़े रहे। मीटिंग खत्म होने के बाद कृषि मंत्री ने कहा कि ताली दोनों हाथों से बजती है।