ANALYSIS : बीजेपी नेताओं में मनमुटाव, पार्टी के लिए एयर स्ट्राइक से भी बड़ी चुनौती!

पुलवामा हमले के बाद हुई एयर स्ट्राइक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रेटिंग में इजाफा कर देश में बीजेपी के पक्ष में माहौल तो खड़ा कर दिया, लेकिन मध्य प्रदेश बीजेपी में हालात उतने बेहतर नहीं लगते. सत्ता से बेदखल बीजेपी के लिए यहां सबसे बड़ा सवाल पार्टी कार्यकर्ताओं में ताकत भरने और बड़े नेताओं के बीच अंतर्कलह दूर करने का है. वहीं एक बड़ा मुद्दा पिछले सात या आठ बार से लगातार चुनाव लड़ रहे सांसदों के खिलाफ बन रही एंटी-इनकंबेंसी का भी है.

कई वरिष्ठ नेताओं ने मैदान पकड़ा

विधानसभा चुनाव में जिस तरह बागियों ने बीजेपी का चुनावी गणित बिगाड़ा था, वैसा ही माहौल लोकसभा चुनाव में भी देखने मिल रहा है. असंतोष के स्वर खुल कर सामने आ रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने फिर से मैदान पकड़ लिया है. वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता पूर्व सांसद रघुनंदन शर्मा ने खुलकर आरोप लगाया है कि पिछले चुनाव में उनके साथ कपट हुआ है. उन्हें मंदसौर से तैयारी करने के लिए कहा गया लेकिन ऐन वक्त पर टिकट काट दिया. अब वे फिर से लोकसभा के लिए अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर अपनी बहू कृष्णा गौर को विधानसभा टिकट दिलवाने के बाद अब लोकसभा के लिए भोपाल से अपनी उम्मीदवारी को लेकर जोर आजमाइश करने में लगे हैं.

शिवराज सिंह के कार्यकाल में वित्त मंत्री रहे राघवजी भाई अब विदिशा सीट पर अपनी बेटी ज्योति शाह के लिए टिकट मांग रहे हैं. इस सीट से केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज सांसद हैं. लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वो अब चुनाव ना लड़ने का एलान कर चुकी हैं. इस सीट से शिवराज सिंह की पत्नी साधना सिंह भी दावेदारों में शुमार हैं. राघवजी भाई लंबे समय तक विदिशा से विधायक रहे हैं. एक विवाद के चलते अपना मंत्री पद खो बैठे. वे यहां से अब अपने परिवार की दावेदारी चाहते हैं.

इंदौर से पूर्व मंत्री रहे सत्यनारायण सत्तन ने पिछले आठ बार की सांसद स्पीकर सुमित्रा महाजन के खिलाफ मैदान पकड़ते हुए चुनाव लड़ने की बात कही है. उन्हें मनाने की खुद सुमित्रा महाजन कोशिश कर रही हैं. संगठन भी सक्रिय है लेकिन सत्तन ने अभी तक माने नहीं हैं.
इस मुद्दे पर बीजेपी के वरिष्ठ नेता लोकसभा चुनाव प्रभारी गोविंद मालू कहते हैं कि पार्टी में पहली दूसरी लाइन में कई उम्मीदवार हैं. यहां कांग्रेस जैसे हाल नहीं हैं. इसलिए नेता अपनी दावेदारी का खुलकर इजहार कर रहे हैं. लेकिन इसमे बागी होने जैसी कोई समस्या नहीं है. बीजेपी में संगठन एक सर्वोच्च शक्ति है. उम्मीदवार तय होने के बाद सब सामान्य हो जाता है.

यूथ लीडरशिप को आगे बढ़ाने की चुनौती

बीजेपी के सामने एक बड़ी चुनौती यूथ लीडरशिप को आगे बढ़ाने की भी है. कई सांसद इतने वरिष्ठ हो चुके हैं कि उनका पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं के साथ वैसा जुड़ाव कम नज़र आता है. संगठन में भी इस जनरेशन गेप को कम करने की ज़रूरत है.

नेतृत्व को लेकर उहापोह
प्रदेश में लोकसभा चुनाव का नेतृत्व कौन करेगा इसे लेकर भी उहापोह की स्थिति है. पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह, नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव के बीच तालमेल बैठाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व को दखल देना पड़ा. प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह के निर्देश के बाद अब एक साथ चुनावी रैलियां शुरू की गई हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट
राजनीतिक विश्लेषक वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र सिंह कहते हैं कि एयर स्ट्राइक के बाद पीएम मोदी की रेटिंग ज़बर्दस्त बढ़ी है, लेकिन यहां संगठन इसे कार्यकर्ताओं तक ले जाने में अभी तक कामयाब नहीं दिखाई दे रहा है. इस बात को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि बागियों को मनाने में असफल बीजेपी संगठन ने विधानसभा चुनाव में मामूली अंतर से सत्ता गंवाई है.