मजदूर नहीं, पूंजी नहीं, बाजार में डिमांड नहीं, पूछ रहे हैं कारोबारी- कैसे चलाएं इंडस्ट्री?

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लखनऊ। लॉकडाउन 4.0 में छूट के बाद फैक्ट्रियों में चहल-पहल तो दिख रही है लेकिन कारोबारियों की टेंशन और बढ़ गई है। कारोबारियों का कहना है कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम (MSME) उद्योगों की जान होते हैं मजदूर लेकिन कोरोना वायरस (Coronavirus) और लॉकडाउन (Lockdown) के चलते अधिकतर मजदूर गांव लौट चुके हैं। दो महीने बाद कारोबारी भी पूरी तरह से खाली हो चुके हैं, बाजार में डिमांड ठप है ऐसे में फैक्ट्री में काम कैसे होगा?

यूपी की हैंडमेड इंडस्ट्री का हाल और ज्यादा बुरा है। पहले से ही बदहाली झेल रहे इस इंडस्ट्री में लॉकडाउन के लिए तय गाइडलाइन में काम कर पाना मुश्किल है। कारोबारियों का कहना है कि हाथ के काम में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नामुमकिन है, ऐसे में उनकी फैक्ट्रियों में प्रोडक्शन पूरी तरह ठप है। इन्हीं परेशानियों को जानने के लिए एनबीटी ऑनलाइन ने मेरठ, सहारनपुर, बरेली, कानपुर और भदोही जिलों में कारोबारियों से बात की।

इंडस्ट्री खुलने के बाद भी भदोही में कालीन प्रोडक्शन ठप

भदोही का कालीन उद्योग छूट मिलने के बाद भी संकट से जूझ रहा है। एक कालीन बनाने के लिए कम से 30 लोगों की जरूरत पड़ती है लेकिन गाइडलाइन के अनुसार, सिर्फ 5 लोग काम कर पा रहे हैं, वह भी ऑफिशल स्टाफ। मजदूर वापस चले गए हैं, कॉन्ट्रैक्टर खाली हाथ हैं, कारोबारियों का माल बंदरगाहों में पड़ा हुआ है। भदोही में कालीन कारोबारी सिद्धार्थ मिश्रा बताते हैं, ‘जो ट्रस्टेट कार्पेट बनता है, उसके पीछे कपड़ा लगाया जाता है जिसे फेविकोल या एक विशेष मसाले से चिपकाया जाता है। अगर उन कारीगरों को बुलाते हैं तो इसमें भी नियम टूटते हैं क्योंकि इस काम में ज्यादा कारीगर लगते हैं और अगर हम सिर्फ ऑफिशल स्टाफ को बुलाते हैं तो सिर्फ अकाउंट और डॉक्यूमेंट का काम हो पाता है। फिलहाल फैक्ट्री में 5 ऑफिशल स्टाफ के साथ काम हो रहा है लेकिन प्रोडक्शन से संबंधित काम ठप है।’

 भदोही का कालीन उद्योग

वह आगे बताते हैं, ‘हमारे पास ऑर्डर हैं लेकिन बुनकर नहीं है। ज्यादातर मजदूर घर चले गए। कॉन्ट्रैक्टर ने हाथ खड़े कर दिए हैं। हमें पुराने ऑर्डर का पैसा नहीं मिल रहा है। कॉन्ट्रैक्टर की भी अलग समस्या है। एक्सपोर्ट न होने की वजह से बॉम्बे पोर्ट पर हमारा काफी सारा माल पड़ा हुआ है जिसका मुझे बराबर किराया देना पड़ रहा है।’

मजदूरों की कमी के चलते काम बंद
इसी इंडस्ट्री से जुड़े कॉन्ट्रैक्टर सुशील कुमार टिबरेवाल बताते हैं, ‘लेबर शॉर्टेज की वजह से काम बंद है। कालीन का ज्यादातर काम बाहरी मजदूर करते थे जो बिहार और पश्चिम बंगाल के हैं। सरकार ने अमीर और गरीब को दिया लेकिन हमारे जैसे मिडिल क्लास के लिए कुछ नहीं है। बैंक से फाइनेंस लिया है उसमें भी हालत खराब है कि कैसे चुकाएंगे। माल बनकर तैयार है लेकिन पार्टियों ने ऑर्डर कैंसल कर दिए है, बताइए हम क्या करें। जो लेबर पैसा लेकर चले गए वो पैसा वापस मिलना नहीं है हमको। आज एक-एक लेबर पर लाख-लाख 50 हजार का अडवांस होता है। पर्सनली मेरे पास 30 से 35 लेबर है और वे सारे जा चुके हैं तो मुझे तो 20-25 लाख रुपये का नुकसान ऐसे ही हो गया।’

MSME

’25 साल में कभी ऐसे दिन नहीं देखे’
कालीन उद्योग पहले से ही मरी हालत में था बीच मे हालत सुधरे लेकिन लॉकडाउन से फिर खराब हो गए। सुशील कहते हैं, ‘स्थानीय मजदूरों से काम कराने का मतलब वह पैसे की मांग करेगा और समय भी लगेगा। अगर हम टाइम से माल नहीं देंगे तो क्या करेंगे। जो मजदूर गए हैं उनका एक साल से पहले लौटना मुश्किल है। जब वापस आएंगे तो उनकी सेफ्टी की सबसे बड़ी चिंता होगी।’

इस इंडस्ट्री में प्रशासन के अनुसार तय गाइडलाइन में काम करना मुश्किल है। वह बताते हैं, इसमें हाथ से काम करना होता है मशीन से नहीं कि दो गज की दूरी पर बिठा गया। 5×8 फीट की कालीन है जिसे दो आदमी बिनते हैं तो सोशल डिस्टेंसिंग कैसे पॉसिबिल है। हमारी इंडस्ट्री खत्म हो रही है। पता नहीं जिंदा रहेंगे या नहीं। 25 साल से जुड़ा हूं इस इंडस्ट्री से। ऐसे दिन हमने भदोही में कभी नहीं देखे। 5-10 साल पिछड़ हो चुका है काम। 20 लाख करोड़ पैकेज में हमको क्या मिला?

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कानपुर: ‘पहले मिल जाती छूट तो न जाते मजदूर’
कानपुर की लेदर इंडस्ट्री पहले से ही बंदी की मार झेल रही है। फैक्ट्रियां कई बार खुलकर बंद हो चुकी हैं। फिर भी जब किसी तरह कुछ चमड़ा फैक्ट्रियां चलाने की इजाजत मिली तो लॉकडाउन हो गया। जाजमऊ स्थित एक टैनरी ओनर फिरोज आलम ने कहते हैं, ‘ पिछले हफ्ते लेदर में सिर्फ एक्सपोर्ट यूनिट खोलने की अनुमति मिली है लेकिन जब तक कच्चा माल बनकर नहीं तैयार होगा तो एक्सपोर्ट क्या होगा? हमारा 70 फीसदी लेबर जा चुका है। इनमें से अधिकतर बिहार, झारखंड और पूर्वांचल जिले जैसे गोरखपुर-बलिया से आते हैं। शुरुआत में हमने उनको अपनी जेब से वेतन देकर किसी तरह उनकी मदद की लेकिन कब तक करते। अप्रैल के आखिर में सारे मजदूर जाने लगे। दो महीने का लॉकडाउन हम पर बहुत भारी पड़ा है। अगर सरकार शुरुआती चरण में ही 20 फीसदी लेबर के साथ अनुमति दे देती तो मजदूर की रोजी-रोटी पर संकट न आता और वे वापस न जाते। हमारे लिए यह तो यह आर्थिक साल पूरा बर्बाद हुआ, प्रॉडक्शन और कमाई सब ठप है।’

मेरठ: ‘स्किल्ड मजदूर चले गए, लोकल के पास ट्रेनिंग नहीं’
मेरठ डिविजन के मंडलीय अध्यक्ष अतुल भूषण गुप्ता बताते हैं, ‘एक दिन पहले मेरठ से 1900 मजदूर अपने घर बिहार और झारखंड रवाना हो गए। ऐसे में स्किल्ड लेबर का संकट है। स्किल्ड लेबर जा चुके हैं और लोकल को ट्रेनिंग देना फिलहाल समस्या है और वक्त भी नहीं है। अभी जो स्थिति है कल उससे ज्यादा दिक्कत आएगी मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री का हाल भी बेहाल है। अतुल बताते हैं, ‘हमारे सामने इस वक्त एक्सपोर्ट का गहरा संकट है क्योंकि स्पोर्ट्स के ऑर्डर कैंसल हो रहे हैं। कारोबारियों में यह भी एक डर है कि कहीं ऑर्डर जालंधर न शिफ्ट कर दिए जाएं जहां मेरठ के बाद दूसरी सबसे बड़ी इंडस्ट्री है।’ अतुल ने बताया कि प्रशासन ने स्पोर्ट्स इंडस्ट्री में सिर्फ एक्सपोर्ट यूनिट को इजाजत दी थी लेकिन इनमें से कई यूनिट प्रशासन की गाइडलाइन फॉलो नहीं कर पाईं और बंद करनी पड़ी।

textiles

अतुल आगे कहते हैं, ‘मेरठ में 300 इंडस्ट्री चलाने की अनुमति है। जो परमीशन मिली है उसके अनुसार, मजदूरों को अपने स्थान पर रखकर 33 फीसदी स्टाफ के साथ काम कराना होगा। उनके रहने खाने का भी इंतजाम करना होगा। मजदूरों के एक स्थान से दूसरे स्थान आने-जाने की कोई इजाजत नहीं थी। इस वजह से हमारे कई लोकल मजदूर भी काम पर नहीं आ पा रहे हैं।’

सहारनपुर: ‘बिना स्किल्ड लेबर के मशीनरी चलाना असंभव’

सहारनपुर इंडियन इंडस्ट्री एसोसिएशन (IIA)के सदस्य प्रमोद मिगलानी बताते हैं, ‘जो प्रवासी मजदूर थे वो अपने गांव जा चुके हैं। उनमें से कुछ स्किल्ड थे कुछ अनस्किल्ड। स्किल्ड लेबर के बिना मशीनरी को चला पाना असंभव है। जब तक कि वो लौटकर नहीं आ जाते तो हम अपनी मशीनरी अच्छी तरीके से नहीं चला सकते। हमारे 50 फीसदी से ज्यादा मजदूर पूर्वी यूपी और बिहार से हैं। प्रमोद मिगलानी ने आगे बताया, सबसे ज्यादा नुकसान यहां के लकड़ी उद्योग को हुआ है क्योंकि एक्सपोर्ट पूरी तरह रुक गया है। प्रमोद बताते हैं कि सहारनपुर में लगभग 2500 इंडस्ट्री होगी जिनमें लकड़ी के अलावा होजरी, पेपर मिल और चीनी मिल वगैरह है। लेकिन अभी इजाजत सिर्फ 670 को चलाने की है जिनमें से कुछ खुली हैं तो कुछ बंद हैं।

Saharanpur

बरेली: ‘जिनके पास पूंजी वही कर पाएंगे कारोबार’
आईआईए के बरेली चैप्टर के चेयरमैन पीयूष अग्रवाल बताते हैं, ‘सबसे बड़ी दिक्कत पूंजी की आ रही है। दो महीने में छोटा कारोबारी खाली हो चुका है। मजदूर सारे चले गए। बिहार के कई सारे स्किल लेबर थे, 12-12 आदमियों का ग्रुप था। वहीं बाजार में अभी सेल नहीं है सिर्फ फूड आइटम बेचे जा रहे हैं। आदमी अभी सिर्फ जरूरत का सामान खरीद रहा है। जैसे-जैसे बाजार खुलेंगे और समस्याएं बढ़ेंगी। पूंजी कोई देने को राजी नहीं है, जिनके पास है वो भी मौके के फायदे का उठा रहे हैं। बरेली में अधिकतर फूड आइटम की यूनिट है जैसे नमकीन, सोया बड़ी, रस्क, और आचार वगैरह। इसके अलावा प्लाइवुड और पैकिंग इंडस्ट्री, दालमिल वगैरह भी है।

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पीयूष आगे कहते हैं, ‘सरकार ने तो MSME की परिभाषा ही बदल दी है। इसमें बड़ा उद्यमी को फायदा है, छोटे कारीगर तो लोन ले नहीं सकते हैं। ये तो स्वाभाविक सी बात है कि जिस आदमी की जितनी क्षमता होती है वह उतना लोन लेकर काम करता है। दो महीने में छोटा कारोबारी बर्बाद हो गया है। अब दोबारा इंडस्ट्री खोली है तो उसे लेबर का भी पैसा देना है। बैंक का लोन भी, बिजली का बिल भी चुकाना है। फिलहाल इसे कुछ समय के लिए पेंडिंग कर दिया गया है लेकिन एक बोझ तो है ही, माफ तो नहीं किया गया है। एक महीने में कई सारी इंडस्ट्री बंद हो जाएंगी। जिनके पास पूंजी है वही सर्वाइव कर पाएंगे।’

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