Special report : आखिर एनकाउंटर के मामलों में क्यों विवादों में रहती है उत्तर प्रदेश पुलिस?

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उप्र के कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद से ही उप्र पुलिस निशाने पर है, इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में कुछ याचिकाएं भी दायर कर मामले में संज्ञान लेने का अनुरोध किया गया है। योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने के बाद से विकास दुबे ऐसा 119वां शख्स था जो पुलिस की क्रॉस फाइरिंग में मारा गया है। इस एनकाउंटर पर सवाल इसलिए उठा क्योंकि घटना स्थल की परिस्थितियां पुलिस द्वारा बताई गई कहानी से मेल नहीं खा रही थी। ऐसा पहली बार नहीं है। देश में पुलिस द्वारा किए गए अधिकांश एनकाउंटर के खिलाफ सैकड़ों की संख्या में शिकायतें की गई हैं। अकेले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में ही वर्ष 2000 से 2017 के बीच फेक एनकाउंटर के 1,782 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इनमें से 794 मामले (यानी 44.55 प्रतिशत) अकेले उत्तर प्रदेश के हैं। हालांकि 2015 से 2019 के बीच की बात करें तो फेक एनकाउंटर के मामले में आंध्र प्रदेश पहले स्थान पर पहुंच गया है।

इन पांच सालों में फेक एनकाउंटर के यहां 57 मामले दर्ज किए गए जबकि 39 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर रहा। सुप्रीम कोर्ट की एक जजमेंट के अनुसार ऐसे एनकाउंटर के मामलों में एफआईआर दर्ज होनी चाहिए, जिसकी पुलिस द्वारा जांच की जाए और जिसमें यह पता लगाया जाए कि असल में हुआ क्या था। जजमेंट में यह भी कहा गया है कि ऐसे एनकाउंटर की जांच एनकाउंटर में शामिल पुलिस नहीं कर सकती।

वो अलग लोग होंगे। ऐसी सूरत में मामले की वीडियोग्राफी होनी जरूरी होती है। एफआईआर में पुलिस वालों को अभियुक्त बनाया जाना चाहिए और आईपीसी की धारा 302 लगाना चाहिए। पूरे मामले की जांच में यह साबित करना होगा कि आत्मरक्षा में गोली चलाई गई। जानकारों के अनुसार एनकाउंटर फेक साबित होने पर दोषी पुलिस वालों को उम्र कैद से लेकर फांसी तक की सजा होने का प्रावधान है। आइए इस रिपोर्ट में जानते हैं फेक एनकाउंटर के संबंध में क्या कानूनी प्रावधान हैं।
अगर एनकाउंटर फेक है तो कार्रवाई का क्या प्रावधान है?
पुलिस मुठभेड़ में मारे गए लोगों के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सन 2014 में तत्कालीन चीफ जस्टिस आरएम लोढा का फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे किसी भी एनकाउंटर के बाद एफआईआर दर्ज करके सीआरपीसी की धारा 157 और 158 के तहत उसे स्थानीय अदालत में बगैर विलंब के भेजा जाए। एफआईआर की स्वतंत्र जांच सीआईडी या दूसरे थाने की पुलिस द्वारा की जानी चाहिए। एनकाउंटर की सत्यता की जांच के लिए मजिस्ट्रेट जांच का प्रावधान है। इन मामलों का विवरण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को अविलम्ब भेजा जाए। जांच के बाद यदि कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसका निलंबन होना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 20 के तहत पुलिस अधिकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उनके हथियारों को सरेंडर करवा कर उनकी जांच का भी प्रावधान है। मुठभेड़ में शामिल पुलिस अधिकारियों को इनाम देने पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगाया है।

Dainik Bhaskar
संयुक्त राष्ट्र का क्या है रुख?
फर्जी मुठभेड़ों पर पिछले साल संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार हाई कमिश्नर कार्यालय ने भी चिंता जताते हुए केंद्र सरकार को पत्र लिखा था। इस पत्र में खासकर उत्तरप्रदेश में एक समुदाय विशेष के लोगों को निशाने पर लेकर की गई 15 फर्जी मुठभेड़ों का जिक्र किया गया था।

चर्चित मामले: जब पुलिस एनकाउंटर फर्जी पाए गए और दोषी लोगों को सजा मिली

पीलीभीत में 1991 के एनकाउंटर में 11 सिख तीर्थ यात्रियों की पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु हो गई थी, जिसके लिए 47 पुलिस वालों को सीबीआई अदालत ने दोषी करार दिया।
देहरादून में 2009 में एक छात्र की हत्या के मामले में 7 पुलिस अफसरों को आजीवन कारावास की सजा हुई थी।
मुंबई में छोटा राजन गिरोह के आदमी की 2006 में पुलिस एनकाउंटर में मौत पर सेशन कोर्ट ने 2013 में 11 पुलिस वालों को उम्रकैद की सजा दी।
फेक एनकाउंटर को लेकर क्या कहते हैं आंकड़े?

1,782 शिकायतें फेक एनकाउंटर की 2000 से 2017 के बीच दर्ज की गईं।
1,565 शिकायतों का इस दौरान निराकरण किया गया।
794 शिकायतें अकेले उत्तर प्रदेश से इन 17 सालों में दर्ज की गईं।
3 सवालों के आधार पर जानिए फेक एनकाउंटर और उससे जुड़े कानून

क्या इस तरह के मामलों में न्यायालय स्वत: संज्ञान ले सकता है?
हिरासत में मौत और फर्जी एनकाउंटर को रोकने के लिए पर्याप्त कानूनी और संवैधानिक प्रावधान हैं। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के फैसले में विस्तृत गाइड लाइन जारी की है। उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर्स की बढ़ती संख्या के बारे में 2 साल से एक याचिका पर सुनवाई हो रही है। विकास दुबे के एनकाउंटर के बारे में भी सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में याचिका और प्रतिवेदन लंबित हैं। इन सब मामलों पर न्यायिक सुनवाई होगी। इसके अलावा, हाइकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट इस तरह के मामले में स्वत: संज्ञान भी ले सकते हैं।

दोषी पाए जाने वाले पुलिस वालों को अधिकतम कितनी सजा मिल सकती है?

ऐसे मामलों पर यदि हत्या का मामला दर्ज हुआ तो कानून के अनुसार अधिकतम आजीवन कारावास और फांसी की सजा हो सकती है। वैसे भी पुलिस को किसी को भी मारने का अधिकार नहीं है। हालांकि आईपीसी की धारा 100 के तहत पुलिस को आम जनता की तरह आत्मरक्षा का अधिकार है। यदि कोई अपराधी पुलिस हिरासत से या पुलिस मुठभेड़ में भागने की कोशिश करे तो उसे पकड़ने या काबू में करने के लिए सीआरपीसी की धारा 46 के तहत पुलिस बल प्रयोग के इस्तेमाल की इजाजत दी जाती है।
किसी भी एनकाउंटर के बाद पुलिस किस तरह खुद को निर्दोष साबित करती है ?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के पैरा 31.3 में जांच आयोग के लिए अनेक दिशा निर्देश निर्धारित किए हैं। इसके अनुसार मजिस्ट्रेट को सभी साक्ष्य जैसे फिंगर प्रिंट, गवाहों का विवरण और मौका- ए- वारदात के फोटो और वीडियो तुरंत बनवाने का प्रावधान है। पोस्टमार्टम, हथियारों की जांच, मृत्यु का क्राइम सीन जैसे कई पहलुओं की जांच के बाद मजिस्ट्रेट रिपोर्ट बनती है। यूपी में पिछले 3 वर्षों में पुलिस मुठभेड़ में मारे गए 119 मामलों में मजिस्ट्रेट जांच के बाद 74 मामलों में पुलिस अधिकारियों को क्लीन चिट मिली।

आने के बाद से विकास दुबे ऐसा 119वां शख्स है जो पुलिस की क्रॉस फाइरिंग में मारा गया है।  इस एनकाउंटर पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि घटना स्थल की परिस्थितियां पुलिस द्वारा बताई गई कहानी से मेल नहीं खा रही हैं। ऐसा पहली बार नहीं है। देश में पुलिस द्वारा किए गए अधिकांश एनकाउंटर के खिलाफ सैकड़ों की संख्या में शिकायतें की गई हैं। अकेले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में ही वर्ष 2000 से 2017 के बीच फेक एनकाउंटर के 1,782 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इनमें से 794 मामले (यानी 44.55 प्रतिशत) अकेले उत्तर प्रदेश के हैं। हालांकि 2015 से 2019 के बीच की बात करें तो फेक एनकाउंटर के मामले में आंध्र प्रदेश पहले स्थान पर पहुंच गया है।

इन पांच सालों में फेक एनकाउंटर के यहां 57 मामले दर्ज किए गए जबकि 39 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर रहा। सुप्रीम कोर्ट की एक जजमेंट के अनुसार ऐसे एनकाउंटर के मामलों में एफआईआर दर्ज होनी चाहिए, जिसकी पुलिस द्वारा जांच की जाए और जिसमें यह पता लगाया जाए कि असल में हुआ क्या था। जजमेंट में यह भी कहा गया है कि ऐसे एनकाउंटर की जांच एनकाउंटर में शामिल पुलिस नहीं कर सकती।

वो अलग लोग होंगे। ऐसी सूरत में मामले की वीडियोग्राफी होनी जरूरी होती है। एफआईआर में पुलिस वालों को अभियुक्त बनाया जाना चाहिए और आईपीसी की धारा 302 लगाना चाहिए। पूरे मामले की जांच में यह साबित करना होगा कि आत्मरक्षा में गोली चलाई गई। जानकारों के अनुसार एनकाउंटर फेक साबित होने पर दोषी पुलिस वालों को उम्र कैद से लेकर फांसी तक की सजा होने का प्रावधान है। आइए इस रिपोर्ट में जानते हैं फेक एनकाउंटर के संबंध में क्या कानूनी प्रावधान हैं।
अगर एनकाउंटर फेक है तो कार्रवाई का क्या प्रावधान है?
पुलिस मुठभेड़ में मारे गए लोगों के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सन 2014 में तत्कालीन चीफ जस्टिस आरएम लोढा का फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे किसी भी एनकाउंटर के बाद एफआईआर दर्ज करके सीआरपीसी की धारा 157 और 158 के तहत उसे स्थानीय अदालत में बगैर विलंब के भेजा जाए। एफआईआर की स्वतंत्र जांच सीआईडी या दूसरे थाने की पुलिस द्वारा की जानी चाहिए। एनकाउंटर की सत्यता की जांच के लिए मजिस्ट्रेट जांच का प्रावधान है। इन मामलों का विवरण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को अविलम्ब भेजा जाए। जांच के बाद यदि कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसका निलंबन होना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 20 के तहत पुलिस अधिकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उनके हथियारों को सरेंडर करवा कर उनकी जांच का भी प्रावधान है। मुठभेड़ में शामिल पुलिस अधिकारियों को इनाम देने पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगाया है।

Dainik Bhaskar

संयुक्त राष्ट्र का क्या है रुख?
फर्जी मुठभेड़ों पर पिछले साल संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार हाई कमिश्नर कार्यालय ने भी चिंता जताते हुए केंद्र सरकार को पत्र लिखा था। इस पत्र में खासकर उत्तरप्रदेश में एक समुदाय विशेष के लोगों को निशाने पर लेकर की गई 15 फर्जी मुठभेड़ों का जिक्र किया गया था। 

चर्चित मामले: जब पुलिस एनकाउंटर फर्जी पाए गए और दोषी लोगों को सजा मिली

  •  पीलीभीत में 1991 के एनकाउंटर में 11 सिख तीर्थ यात्रियों की पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु हो गई थी, जिसके लिए 47 पुलिस वालों को सीबीआई अदालत ने दोषी करार दिया।
  •  देहरादून में 2009 में एक छात्र की हत्या के मामले में 7 पुलिस अफसरों को आजीवन कारावास की सजा हुई थी।
  •  मुंबई में छोटा राजन गिरोह के आदमी की 2006 में पुलिस एनकाउंटर में मौत पर सेशन कोर्ट ने 2013  में 11 पुलिस वालों को उम्रकैद की सजा दी।  

फेक एनकाउंटर को लेकर क्या कहते हैं आंकड़े?

  • 1,782 शिकायतें फेक एनकाउंटर की 2000 से 2017 के बीच  दर्ज की गईं।
  • 1,565 शिकायतों का इस दौरान निराकरण किया गया।
  • 794 शिकायतें अकेले उत्तर प्रदेश से इन 17 सालों में दर्ज की गईं।

3 सवालों के आधार पर जानिए फेक एनकाउंटर और उससे जुड़े कानून

क्या इस तरह के मामलों में न्यायालय स्वत: संज्ञान ले सकता है? 
हिरासत में मौत और फर्जी एनकाउंटर को रोकने के लिए पर्याप्त कानूनी और संवैधानिक प्रावधान हैं। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के फैसले में विस्तृत गाइड लाइन जारी की है। उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर्स की बढ़ती संख्या के बारे में 2 साल से एक याचिका पर सुनवाई हो रही है। विकास दुबे के एनकाउंटर के बारे में भी सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में याचिका और प्रतिवेदन लंबित हैं। इन सब मामलों पर न्यायिक सुनवाई होगी। इसके अलावा, हाइकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट इस तरह के मामले में स्वत: संज्ञान भी ले सकते हैं।

दोषी पाए जाने वाले पुलिस वालों को अधिकतम कितनी सजा मिल सकती है? 

ऐसे मामलों पर यदि हत्या का मामला दर्ज हुआ तो कानून के अनुसार अधिकतम आजीवन कारावास और फांसी की सजा हो सकती है। वैसे भी पुलिस को किसी को भी मारने का अधिकार नहीं है। हालांकि आईपीसी की धारा 100 के तहत पुलिस को आम जनता की तरह आत्मरक्षा का अधिकार है। यदि कोई अपराधी पुलिस हिरासत से या पुलिस मुठभेड़ में भागने की कोशिश करे तो उसे पकड़ने या काबू में करने के लिए सीआरपीसी की धारा 46 के तहत पुलिस बल प्रयोग के इस्तेमाल की इजाजत दी जाती है।
किसी भी एनकाउंटर के बाद पुलिस किस तरह खुद को निर्दोष साबित करती है ?  

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के पैरा 31.3 में जांच आयोग के लिए अनेक दिशा निर्देश निर्धारित किए हैं। इसके अनुसार मजिस्ट्रेट को सभी साक्ष्य जैसे फिंगर प्रिंट, गवाहों का विवरण और मौका- ए- वारदात के फोटो और वीडियो तुरंत बनवाने का प्रावधान है। पोस्टमार्टम, हथियारों की जांच, मृत्यु का क्राइम सीन जैसे कई पहलुओं की जांच के बाद मजिस्ट्रेट रिपोर्ट बनती है। यूपी में पिछले 3 वर्षों में पुलिस मुठभेड़ में मारे गए 119 मामलों में मजिस्ट्रेट जांच के बाद 74 मामलों में पुलिस अधिकारियों को क्लीन चिट मिली।

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