पूरी दुनिया की शांति और सुरक्षा के लिए खतरा है चीन, पीएम मोदी की नीतियों से भारत के लिए बढ़ी चुनौती

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जॉर्ज अब्राहम ।

शिकागो के पूर्वमेयर रहम एमेनुएल को एक बार यह कहते हुए उद्धृत किया गया थाः किसी गंभीर संकट को बेकार नहीं जाने दिया जाना चाहिए। ऐसा लगता है कि चीन कोरोना वायरस संकट से फायदा उठाते हुए उसी उक्ति पर काम कर रहा है- यह या तो उसका जान-बूझकर किया गया कुप्रबंधन है या कर्तव्य के प्रति गंभीर लापरवाही- जिस वजह से पूरी दुनिया घुटने पर आ गई है।

इस मारक बीमारी की वजह से अमेरिका में 1,21,000 लोगों की मौत हो चुकी है और भारत को अपने आम नागरिकों के जीवन बचाने के खयाल से इस मारक वायरस पर नियंत्रण के लिए पूरे देश में लाॅकडाउन करना पड़ा। स्थिति को गंभीर बनाते हुए चीन ने लद्दाख में भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कर दी है जिससे भारत के बीस या उससे ज्यादा सैनिक शहीद हो गए हैं। जब पूरी दुनिया कोविड संकट से जूझ रही है, चीन की यह सैन्य कार्रवाई अचानक हुई नहीं लगती बल्कि यह अतिरिक्त क्षेत्र पर कब्जे के लिए सुनियोजित रणनीति का हिस्सा हो सकती है। हाल के हफ्तों में चीनियों ने दक्षिण चीन सागर में वियतनाम की एक मछली मारने वाली नाव डुबो दी है, मलेशिया के तेल अन्वेषण जहाज को घेर-घारकर भगा दिया, ताइवान को धमकी दी और हांगकांग पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। चीन ने कोविड-19 के खतरे पर दुनिया को भरमाने में विश्व स्वास्थ्य संगठन को धूर्तता पूर्ण तरीके से मिला लिया और फिर, वायरस से निबटने के लिए अधिकांश मेडिकल उपकरण और अन्य साजो सामान धड़ाधड़ खरीद लिए तथा बाद में, अपने बेहिसाब लाभ के लिए उन्हीं देशों को वापस बेच दिया।

चीन ने निस्संदेह अपने आपको ऐसा साबित कर दिया है कि वह न सिर्फ दुनिया के स्वास्थ्य और बेहतरी के लिए संकट है बल्कि दुनिया की शांति और सुरक्षा के लिए भी वास्तविक खतरा है। दुनिया में अमेरिकी नेतृत्व की हर वक्त निंदा करते रहने वाले लोगों को चीन की उभरती शक्ति के मद्देनजर अपने आपको थोड़ा रोक लेना चाहिए। शी जिनपिंग के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट तानाशाही मानवाधिकारों के प्रति बहुत थोड़ा आदर रखती है या उनका बिल्कुल ही सम्मान नहीं करती है और असहमत लोगों के साथ घृणा का व्यवहार करती है और अधिकांशतः उन्हें कड़ा दंड देती है। वुहान में जब कोविड संकट चरम पर था, कई ऐसे रोगियों की व्यथा-कथाएं सामने आईं जिनके घर के दरवाजे बाहर से बंद कर दिए गए और उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया गया और लोगों ने पास के शवदाह गृह से ठहाके सुने।

चीनी सैनिकों ने नियंत्रण रेखा पर निःशस्त्र रहने की मूल सहमति को लेकर जिस तरह धोखा दिया, वह उनके धूर्तता पूर्ण और घृणित व्यवहार का अच्छा उदाहरण है। भारतीय सूत्रों के मुताबिक, तनातनी खत्म करने के प्रयास के दौरान शुरू हुआ यह सब अचानक असफल हो गया और मार पिटाई होने लगी। चीनियों के पास कटीले तारों से लिपटे पत्थर और नुकीले डंडे थे। उन्होंने लोगों पर हमले किए और कई लोगों को सीधी चट्टानों से गलवान नदी में फेंक दिया और इनमें से कई नीचे काफी ठंडे हिम नदीय पानी में डूबकर मर गए बताए जाते हैं।

चीन ने कोविड संकट का जिस तरह सामना किया, वह इस बात की झलक है कि इस कम्युनिस्ट देश के शासक किस तरह धूर्त और बेईमान हैं और वे किस तरह सच को दबाते हैं तथा शेष दुनिया को नुकसान पहुंचाने वाले झूठी सूचनाएं फैलाते हैं। अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने सचमुच ही देश में कोरोना वायरस प्रकोप के विस्तार का छुपाया, रोग के कुल मामलों और उनसे होने वाली मौतों की कम संख्या दिखाई। यह रोग 2019 के अंत में चीन के हुबई प्रदेश में फैला लेकिन देश ने सिर्फ 86,000 मामले होने और 4,600 मौत की संख्या बताई है।

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ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद नेब्रास्का के रिपब्लिकन सीनेटर बेनसेस ने कहाः यह दावा गलत है कि कोरोना वायरस से अमेरिका में चीन से अधिक मौतें हुई हैं। बिना किसी गोपनीय सूचना पर टिप्पणी करते हुए यह निश्चित तौर पर दुखद हैः चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने कोरोनो वायरस को लेकर शासन को बचाने के लिए झूठ कहा, झूठ बोल रही है और झूठ बोलना जारी रखेगी।

इसमें शक नहीं कि एक पार्टी शासन वाले राष्ट्रपति के तौर पर शी जिनपिंग बाद में दुनिया भर में फैल जाने वाले इस मारक वायरस को लेकर अपने यहां किए गए राजनीतिक निर्णयों के लिए प्राथमिक तौर पर उत्तरदायी हैं। जबकि सरकारें कोविड-19 को थामने के लिए संघर्ष कर रही हैं, चीन का झूठी सूचनाओं का जाल, डब्ल्यूएचओ के अंदर भ्रष्ट राजनीतिक चालाकी और आचार नीति में कमी इस स्वास्थ्य और आर्थिक संकट के कारण बने हैं।

चीन में अप्रत्याशित राजनीतिक शासन के साथ-साथ पिछले तीन दशकों में चीनी अर्थव्यवस्था के असाधारण विकास ने दुनिया में एक किस्मकी व्यग्रता और गहरी चिंताएं पैदा की हैं। हालांकि इस महामारी के दौरान दक्षिण चीन सागर में उसकी आक्रामक कार्रवाइयों का इस क्षेत्र में देशों ने प्रतिकार भी किया है, इससे चीनी व्यवहार संयमित नहीं हो पाया है। हालांकिअमेरिका चीनी नौसेना शक्ति के बढ़ते खतरे को संतुलित करने के लिए अपने बल का प्रदर्शनकर रहा है, इस क्षेत्र के नेता महामारी से निबटने में इतना लगे हुए हैं और चीनी निवेश तथा मेडिकल सहायता पर इस तरह लगातार निर्भर हैं कि वे या तो सीमित प्रतिरोध कर पा रहे हैं या किसी प्रतिरोध की स्थिति में नहीं हैं।

1962 में चीन और भारत के बीच युद्ध छिड़ गया था। इसमें 3,250 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे जबकि उसे अक्साई चिन खो देना पड़ा था। यह स्विट्जरलैंड के बराबर का क्षेत्र है। स्थायी शांति की भावना कभी भी हासिल नहीं की जा सकी क्योंकि चीन ने दबी-छुपी और चोरी भरी कार्रवाइयों के जरिये छोटी-मोटी घुसपैठ और जमावट जारी रखी जिसे भारत ने कभी सुनियोजित ढंगसे बढ़ने नहीं दिया। वैसे भी, भारत चीनी संवेदनशीलताओं के प्रति काफी सतर्क रहा है और वह दक्षिण चीन सागर में चीनी हस्तक्षेप को लेकर निरपेक्ष रुख रखता रहा है।

यह ध्यान रखने की बात है कि पता नहीं, यह दलाई लामा के साथ कम संबंध रखने या फिर, चीनी नेताओं के साथ वार्षिक द्विपक्षीय वार्ताएं करने के प्रयास हों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुष्टिकरण की नीतियों ने काम नहीं किया है। भारत का अधिकतर फोकस पाकिस्तान पर रहा है, चीन ने सेना का उपयोगकर क्षेत्रीय यथा स्थिति को धीरे-धीरे बदलने में सफलता हासिल कर ली है। नेपाल के साथ कुप्रबंधीय रिश्ते और अपने निकट पड़ोसियों से भारत को समर्थन की कमी भी केंद्र सरकार के विफल क्षेत्रीय नेतृत्व के संकेत हैं।

जब चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में शामिल हुआ था, तब दुनिया ने आशा की थी कि बाजार के उदारीकरण से यह राजनीतिक स्वतंत्रता और अधिक प्रतिनिधित्व के शासन वाले देश के तौर पर खुलेगा। पर बहुत कुछ नहीं बदला है। इस वक्त चीनी कम्युनिस्ट तानाशाही की दमनकारी नीति ने फिर साबित किया है कि यह दुनिया भर के देशों के लिए सिर्फ स्वास्थ्य और बेहतरी के लिए ही गंभीर संकट नहीं है बल्कि उनकी शांति और सुरक्षा के लिए भी प्रमुख उभरता हुआ खतरा है।

(लेखक संयुक्त राष्ट्र में चीफ टेक्नोलाॅजी अफसर रहे हैं और इंडियन ओवरसीज कांग्रेस,अमेरिका के उपाध्यक्ष हैं। लेख में दिए विचार उनके अपने हैं।)

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