अनिल अंबानी का कर्ज उतारेगा रफाल!

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नई दिल्ली। लंबे इंतजार के बाद आखिरकार राफेल लड़ाकू विमानों (Rafael fighters) के पहली खेप भारत पहुंच चुकी है। इस विमान को बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी दसॉ ने अनिल अंबानी की कंपनी को भारत में ऑफसेट पार्टनर बनाया था। राफेल के भारत पहुंचते ही एक बार फिर राफेल और अनिल अंबानी के बारे में सोशल मीडिया पर चर्चा का दौर शुरू हो गया है। कई यूजरों का कहना है कि राफेल सौदा अनिल अंबानी को अपना कर्ज उतारने में मदद कर सकता है।

अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप 1 लाख करोड़ से ज्‍यादा कर्ज में है। मार्च 2018 के आंकड़ों के मुताबिक रिलायंस ग्रुप के रिलायंस कैपिटल पर 46 हजार 400 करोड़ रुपये का कर्ज है। वहीं अगर आरकॉम की बात करें तो 47 हजार 234 करोड़ रुपये के कर्ज में डूबी है। रिलायंस होम फाइनेंस और इंफ्रा के कुल कर्ज 36 हजार करोड़ रुपये हैं। इसी तरह रिलायंस पावर पर 31 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है। हाल ही में अनिल अंबानी बिलेनियर क्‍लब से भी बाहर हो गए थे।

अंबानी को फायदा पहुंचाने का आरोप
फ्रांस दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में राफेल सौदे की घोषणा की थी। विपक्ष का आरोप था कि 37 राफेल विमानों की खरीद के लिए 8.6 बिलियन डॉलर के सौदे की डील में गड़बड़ी हुई थी और इसमें अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने की कोशिश हुई। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का कहना था कि भारत सरकार के प्रस्ताव पर ही रिलायंस को पार्टनर बनाया गया, इसके अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक दसॉल्ट को कुल कीमत का 50 प्रतिशत यानी 30 हजार करोड़ रुपये का निवेश रक्षा क्षेत्र में करना है।

दिवालिया कंपनी को क्यों मिली तरजीह
वर्ष 2015 में बेंगलुरु में आयोजित हुए एयर शो के दौरान दसॉ और अनिल अंबानी की कंपनी के बीच संयुक्त उद्यम (ज्वाइंट वेंचर) की योजना बनी। इसके दो महीने बाद ही मोदी की ओर से राफेल सौदे की घोषणा होनी थी। विपक्ष खासकर कांग्रेस ने इस पर इस पर सवाल उठाए थे कि एचएएल जैसी सरकारी कंपनी को छोड़कर दिवालिया हो चुकी एक निजी कंपनी को क्यों तरजीह दी गई। फ्रांस के राष्ट्रीय अखबार ली मोंडे ने दावा किया था कि अनिल अंबानी की फ्रांस में स्थित टेलीकॉम कंपनी का 14 करोड़ यूरो का कर्ज राफेल डील की घोषणा के बाद माफ किया गया। हालांकि, रिलायंस कम्युनिकेशन ने इस दावे को खारिज किया था। कंपनी ने कहा था कि टैक्स से जुड़ा मामला फ्रांस के कानून के आधार पर ही सुलझाया गया है।

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