Corona cases in India: विशेषज्ञ बोले, हर्ड इम्युनिटी के भरोसे रहे तो भारत में होंगी लाखों मौतें

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नई दिल्ली। देश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत में कोरोना संक्रमितों की कुल संख्या 3 लाख पार कर चुकी है और भारत दुनिया में सर्वाधिक प्रभावित देशों की सूची में चौथे स्थान पर आ गया है। देश में कोरोना के प्रकोप को रोकने के लिए करीब दो महीने तक सख्त लॉकडाउन रहा। लेकिन इसमें ढील के बाद से कोरोना तेजी से पैर पसारने लगा है। बीबीसी ने भारत में कोरोना की स्थिति पर एक व्यापक विश्लेषण किया है और इस पर कुछ सवाल उठाए हैं।
क्या मामलों में तेजी से भारत को चिंतित होना चाहिए?
कुल मिलाकर देखें तो भारत का प्रदर्शन उतना बुरा नहीं है। भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या 3 लाख पार कर गई है और वह दुनिया में सर्वाधिक प्रभावित देशों की सूची में अमेरिका, ब्राजील और रूस के बाद चौथे नंबर पर है। कॉर्नेल युनिवर्सिटी में इकनॉमिक्स के प्रोफेसर कौशिस बासु का कहना है कि भारत प्रति व्यक्ति संक्रमण के हिसाब से दुनिया में 143वें स्थान पर है।

वायरस के बढ़ने की दर कम हुई है और संक्रमण के दोगुना होने का समय बढ़ा है। लेकिन करीब से देखने पर पता चलता है कि मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद जैसे ज्यादा प्रभावित शहरों में मामले तेजी बढ़ रहे हैं और लोगों के अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु दर भी बढ़ रही है। कोविड-19 के मरीजों का इलाज कर रहे एक फिजिशियन ने कहा, ‘अगर इसी तरह संक्रमण बढ़ता रहा तो इन शहरों की हालत न्यूयॉर्क जैसी हो जाएगी।’

इन शहरों से भयावह रिपोर्टें आ रही हैं। अस्पतालों में मरीजों को भर्ती नहीं किया जा रहा है और वे दम तोड़ रहे हैं। एक मामले में तो मरीज के टॉयलेट में मरने की भी खबर आई है। लैबों में क्षमता से ज्यादा नमूने आ रहे हैं जिससे टेस्ट में देरी हो रही है या टेस्ट पेंडिंग हैं। हार्वर्ड ग्लोबल हेल्थ इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर आशीष झा ने कहा, ‘मैं भारत में बढ़ रहे मामलों से चिंतित हूं। ऐसा नहीं है कि कोरोना पीक पर पहुंचने के बाद अपने आप कम हो जाएगा। उसके लिए आपको कदम उठाने होंगे।’

उन्होंने कहा कि भारत हर्ड इम्युनिटी विकसित करने के लिए 60 फीसदी आबादी के संक्रमित होने का इंतजार नहीं कर सकता है। इससे लाखों लोगों की मौत होगी और यह कोई स्वीकार्य हल नहीं है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में बायोस्टैटिक्स के प्रोफेसर भ्रमर मुखर्जी कहती हैं कि भारत में अभी कोरोना के कर्व में गिरावट नहीं आई है। उन्होंने कहा, ‘हमें चिंता करनी चाहिए लेकिन यह चिंता घबराहट में नहीं बदलनी चाहिए।’

क्या भारत की कम मृत्यु दर भ्रामक है?
इसका उत्तर हां भी है और नहीं भी। भारत का केस फैटेलिटी रेट (सीएफआर) यानी कोविड पॉजिटिव मरीजों की मौत का अनुपात करीब 2.8 फीसदी है। लेकिन संक्रमण के आंकड़ों के साथ-साथ इसमें भी स्पष्टता नहीं है। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन में गणितज्ञ एडम कुचारस्की का कहना है कि कुल मामलों और कुल मौतों में संबंध निकालने से पूरी तस्वीर साफ नहीं होती है। इसमें अनरिपोर्टेड केस शामिल नहीं हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि महामारी के इस चरण में सीएफआर देखने से सरकारों को आत्ममुग्धता हो सकती है। मुखर्जी ने कहा सीएफआर एक भ्रम है। अगर मैं रिपोर्टेड केस और मृतकों की संख्या पर विश्वास कर भी लूं और अगर हम क्लोज मामलों को मृतकों की संख्या से डिवाइड करें तो मृत्यु दर का प्रतिशत बहुत अधिक आएगा।

भारत को क्या चिंता करनी चाहिए?
भारत को इसे पैचवर्क पेनडेमिक की तरह देखना चाहिए। यानी जब संक्रमण देश में फैलता है तो यह अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करता है। अटलांटिक मैगजीन में साइंस राइटर एड यंग के मुताबिक किसी महामारी में कई फैक्टर काम करते हैं। जैसे सोशल डिस्टेंसिंग, टेस्टिंग क्षमता, जनसंख्या घनत्व, आयु संरचना आदि।

भारत में लाखों प्रवासियों ने देश के कोने-कोने में कोरोना संक्रमण फैलाया। ओडिशा में 80 फीसदी मामलों के लिए प्रवासी कामगार ही जिम्मेदार हैं। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के वस्कुलर सर्जन अंबरीश सात्विक ने कहते हैं कि भारत में इस महामारी को अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग ढंग से देखने की जरूरत है।

क्या लॉकडाउन से मदद मिली?
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने शुरुआत में ही लॉकडाउन करके अच्छा काम किया। डॉ. झा ने कहा, किसी भी देश ने इतनी जल्दी लॉकडाउन नहीं किया। इससे सरकार को कोरोना के खिलाफ जंग के लिए उपाय करने का समय मिल गया। इससे कई मौतों को टाला जा सका है।

लेकिन यह चार घंटे के नोटिस पर हुआ और इससे प्रवासियों में घर जाने की होड़ लग गई। यह बहस का मुद्दा है कि सरकारों ने लॉकडाउन के दौरान अपनी तैयारियों को दुरुस्त किया या नहीं। लेकिन केरल और कर्नाटक ने गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली से बेहतर काम किया। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत ने अच्छी तैयारी की होती तो मुंबई, अहमदाबाद और दिल्ली में ऐसी हालत नहीं होती।

आगे की योजना क्या है?
देश में अब भी पर्याप्त टेस्ट नहीं हो रहे हैं। हालांकि अब देश में अब रोज 1.5 लाख टेस्ट हो रहे हैं लेकिन इस मामले में भारत अब भी बाकी देशों से काफी पीछे है। कई लोगों का मानना है कि भारत को पहले ही अपनी टेस्टिंग क्षमता बढ़ा देनी चाहिए थी क्योंकि देश में पहला मामला 30 जनवरी को ही आ गया था।

दिल्ली में आने वाले दिनों में कोरोना के मामलों में बहुत तेजी आने की आशंका है। इसे देखते हुए सरकार ने निजी अस्पतालों को कोविड-19 के मरीजों के लिए ज्यादा बेड की व्यवस्था करने को कहा है। लेकिन विशेषज्ञों को इसमें संदेह है। डॉ. सात्विक ने कहा, ‘आपको नया इन्फ्रास्ट्रक्चर चाहिए। आपको क्षमता बढ़ाने की जरूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि महज अफसरों को इधर-उधर करने और काम चलाऊ नीति से कोरोना संकट से निपटने में मदद नहीं मिलेगी।’

डॉ. झा ने कहा, यह मुश्किल स्थिति है। हम अभी इस महामारी के शुरुआती दौर में हैं। अभी इससे उबरने में एक साल का समय लग सकता है। सवाल यह है कि अगले 12 से 16 महीने के लिए सरकार के पास क्या योजना है।

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