क्या है जी-20 ? इस बार की बैठक में किन-किन मुद्दों का निकलेगा हल ?

Spread the love

ओसाका।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के ओसाका में 28 और 29 जून को होने वाली जी-20 शिखर सम्मलेन की बैठक में हिस्सा लेंगे। शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दो हफ्ते बाद आयोजित की जा रही यह बैठक भारत की अर्थव्यवस्था और विदेश नीति दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है। इस बैठक में तीन प्रमुख मुद्दे होंगे। एक है अमेरिका और चीन के बीच चल रहा व्यापार युद्ध, दूसरा है इस बैठक के मौके पर होने वाली अलग-अलग बैठकें और तीसरा क्या भारत को अपने हितों की रक्षा करने के लिए अमेरिका या चीन और रूस में से किसी एक पक्ष को चुनना होगा। हालांकि तीसरे मुद्दे पर फैसला इस एक ही बैठक में होने की संभावना नहीं है लेकिन इस बैठक में भारत की भूमिका क्या रहती है यह देखना होगा।

भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी सहित 19 देश और यूरोपीय संघ जी-20 के सदस्य हैं। वैश्विक वित्तीय संकट के समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय स्थिरता बनाये रखने के उद्देश्य से इस संघटन की स्थापना हुयी थी। जी-20 की पहली बैठक 2008 में हुयी थी। अब तक इस संगठन की 13 बैठकें हो चुकी हैं। जी-20 विभिन्न स्तरों पर कार्य करता है जैसे सदस्य देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्रियों की बैठक, वित्त मंत्रियों की बैठक और विदेश मंत्रियों की बैठक। 20 सदस्यों के अलावा इस बैठक में कुछ देश आमंत्रित अतिथि के तौर पर हिस्सा लेते हैं जैसे- मिस्र, स्पेन, चिली, नेदरलेंड्स, सेनेगल, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम।

अमेरिका और चीन के बीच में व्यापार को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुयी है। चीन के साथ अपने व्यापार के असंतुलन को काम करने के लिए और अमेरिका फर्स्ट की अपनी नीति को बढ़ावा देने के लिए ट्रम्प ने चीन से आयात होने वाली कई चीज़ों पर टैरिफ बढ़ा दिया था। जापान में जी-20 शिखर सम्मलेन से पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच मुलाक़ात होगी। इस मुलाक़ात को व्यापार युद्ध का समाधान ढूंढ़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। चीन का मानना है की जब तक अमेरिका टैरिफ पर अपनी नीति में बदलाव नहीं करता तब तक इस समस्या का कोई समाधान नहीं निकल सकता। लेकिन अमेरिका और चीन के बीच का विवाद सिर्फ आर्थिक मामलों तक सीमित नहीं है। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच संघर्ष की स्थिति बनी हुयी है। चीन सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण दक्षिण चीन सागर को अपना अधिकार क्षेत्र मानता है। तो अमेरिका की कोशिश चीन को चुनौती देकर अपना प्रभाव बढ़ाने की है। अमेरिका के खिलाफ चीन को रूस का भी समर्थन है। क्योंकि ईरान मामले में और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष में रूस और अमेरिका आमने सामने हैं। इसीलिए ट्रंप और जिनपिंग की मुलाक़ात से अमेरिका और चीन के बीच लम्बे समय से चल रहे संघर्ष का कोई समाधान निकलने की संभावना फिलहाल कम नज़र आ रही है।
जी-20 के साथ होने वाली अन्य बैठकें
28 और 29 जून को जी-20 शिखर सम्मलेन होने के साथ-साथ अन्य बैठकों का भी आयोजन होगा। इन बैठकों में द्विपक्षीय वार्ता से लेकर ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) और आर.आई.सी. (रूस, इंडिया, चीन) देशों के बीच वार्ता होगी। शी जिनपिंग के अलावा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल, टर्की के राष्ट्रपति एर्डोगन, जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के साथ भी मुलाक़ात करेंगे। इन सभी बैठकों पर अमेरिका-चीन विवाद का प्रभाव रहेगा और दोनों देश एक दूसरे के ख़िलाफ़ अपना पक्ष और अपने हितों की रक्षा पर ज़ोर देने की कोशिश करेंगे।
भारत की भूमिका
भारत के लिए इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मुलाक़ात सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा होगा। अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ के भारत दौरे के बाद होने वाली यह बैठक भारत के लिए अमेरिका से व्यापार और सामरिक संबंधों में आये तनाव को दूर करने का एक मौका होगा। अमेरिका-ईरान संघर्ष में भारत को तेल की आयत रोकने से होने वाले नुक़सान का समाधान निकलना भारत के लिए ज़रूरी है। हाल ही में अमेरिका ने भारत को जनरलाइज़्ड सिस्टिम ऑफ़ प्रेफरेन्सेस (जीएसपी) की सूची से बाहर किया है। यह एक सुविधा है जो विकासशील देशों को अमेरिका में निर्यात करने पर टैक्स में छूट देती है। अमेरिका के इस कदम से भारत के निर्यात पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। अमेरिका के अलावा भारत चीन और रूस से भी अलग से मुलाक़ात करेगा। ध्रुवीकरण की तरफ़ बढ़ रहे हालात में क्या भारत सभी पक्षों से अपने रिश्तों में संतुलन बना पाता है यह इस बैठक में देखना होगा।
अन्य चुनौती
तीन प्रमुख चुनौतियों के साथ ही एक और चुनौती है। वह है संस्थानों की भूमिका। बढ़ते ध्रुवीकरण के बीच जी-20 या अन्य संस्थानों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। क्या ध्रुवीकरण और संरक्षणवाद पर नियंत्रण पाने में यह संसथान सफल हो पाते हैं यह अभी देखना बाकी है। संस्थानों के सदस्य और महाशक्तियों के अपने संघर्ष के बीच सभी के हितों के रक्षा करना एक चुनौतीपूर्ण काम है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *