कोरोना के साथ जीने के लिए जीवन शैली में बदलाव जरूरी

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कृष्णमोहन झा (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार है)

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) इस वायरस को महामारी घोषित कर चुका है। WHO ने चेतावनी देते हुए कहा कि हो सकता है कि कोरोनावायरस कभी खत्म न हो और दुनिया को इसके साथ जीना सीखना होगा। कोरोना के कारण जीवन शैली में होने वाले बदलावों से जागरूक कराता वरिष्ठ पत्रकार कृष्णा मोहन झा का ये लेख।

हमारे देश में कोरोना वायरस के संक्रमण की शुरुआत हुए दो माह से भी अधिक समय बीत चुका है और इस जानलेवा वायरस ने इस अवधि में ढाई हजार से अधिक लोगों को मौत की नींद सुला दिया है जिनमें बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक शामिल रहे हैं | कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या भी 85 हजार से अधिक हो चुकी है| यह सिलसिला थमने की कोई उम्मीद भी दिखाई नहीं दे रही है | आश्चर्य की बात यह है कि जिस देश को कोरोना वायरस ने सबसे पहले अपनी गिरफ्त में लिया था वह चीन अब इसकी गिरफ्त से मुक्त होकर चैन की सांस ले रहा है और चीन से बाहर निकल कर यह वायरस अब सारी दुनिया में ऐसी तबाही मचा रहा है कि अमेरिका, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन जैसी महाशक्तियां भी इसके प्रकोप के सामने खुद को असहाय महसूस कर रही हैं | हम इस बात पर संतोष व्यक्त कर सकते हैं कि इन महा शक्तियों सहित दुनिया के अनेक देशों के मुकाबले हमारे देश में कोरोना संंक्रमितों और इसके कारण होने वाली मौतों की संख्या काफी कम है परंतु जिस चीन में सबसे पहले कोरोनावायरस के संक्रमण की शुरुआत हुई थी उसके मुकाबले हमारे देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या अब कहीं अधिक हो चुकी है और हम इस कडवी हकीकत को स्वीकार करने के लिए भी मजबूर हो चुके हैं कि अब हमें कोरोना को जिंदगी का एक हिस्सा मानकर इसके साथ ही आगे बढ़ना होगा |

दो माह पहले हम यह दावा करते थे कि हम कोरोना के खिलाफ अपनी इस कठिन जंग को जीतकर ही दम लेंगे कोरोना के साथ अपनी दो माह की अथक लड़ाई के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि कोरोना वायरस हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है | अभी हाल में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो यहां तक कह दिया है कि हो सकता है यह वायरस कभी खत्म ही न हो | दुनिया भर के वैज्ञानिक कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने के प्रयासों में जुटे हुए हैं लेकिन यह कहना अभी मुश्किल प्रतीत हो रहा है कि उन्हें अपने प्रयासों में कब सफलता मिलेगी लेकिन कहकर तो हम केवल सावधान रहकर ही कोरोना संक्रमण से अपना बचाव कर सकते हैं |कोरोना वायरस ने जब चीन से बाहर निकल कर दुनिया भर में अपने पैर पसारना शुरू किया तो जिन देशों ने इसके संक्रमण का फैलाव रोकने के लिए आवश्यक रणनीति तैयार करने में देर कर दी उन्हें आज पछतावा हो रहा है | चीन ने भी इस जानलेवा वायरस के बारे में विश्व के दूसरे देशों को सचेत करने की आवश्यकता नहीं समझी | यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि चीन ने अंतर्राष्ट्रीय जगत को इस वायरस के खतरे के बारे में पहले ही अवगत करा दिया होता तो शायद बाकी देश इसका मुकाबला करने के लिए पहले ही कमर कस कर तैयार हो चुके होते |चीन की मदद से विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष पद की कुर्सी हासिल करने वाले डॉ गेब्रेयेसस पर भी अब यह आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने इस पूरे मामले में चीन का बचाव करने का प्रयास किया |

खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन भी यह स्वीकार कर चुका है कि उसने कोरोना वायरस के जानलेवा संक्रमण के प्रति विश्व को समय रहते सचेत करने की जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया और जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थीं लेकिन प्रधान मंत्री मोदी ने देश में इस वायरस के संक्रमण का प्रसार रोकने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की चेतावनी कारास्ता देखे बिना ही संपूर्ण लेकिन डाउन का कठोर फैसला किया जिसके कारण देश में कोरोना वायरस तेज़ी से पांव पसारने में सफल नहीं हो पाया |विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी समय रहते लाक डाउन लागू करने के लिए भारत की सराहना की है परंतु लाक डाउन के बावजूद अब देश में कोरोना संक्रमण के मामले जिस तरह तेज़ी से बढ़ रहे हैं उसने सरकार को इस कड़वी हकीकत को स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया है कि कोरोना को जड़ मूल से मिटाना फिलहाल तो संभव नहीं है इसलिए हमें अब कोरोना को जीवन का हिस्सा मानकर ही आगे बढ़ना होगा ।


पिछले दो महीनों के अनुभवों से तो अब इसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि कोरोना संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए लाक डाउन के अलावा और दूसरा रास्ता भी नहीं था और इसके माध्यम से कोरोना संक्रमण पर काबू पाने में सहायता भी मिली परंतु आज की तारीख़ में देश में कोरोना संक्रमितों और संक्रमण के कारण होने वाली दुर्भाग्यपूर्ण मौतों के जो आंकडे सामने आ रहे हैं उन्हें देखकर अब ऐसा प्रतीत होने लगा है कि लाक डाउन से भी हमारा उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा है | लाक डाउन को अनिश्चित काल तक जारी रखना भी संभव नहीं है |इसीलिए केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें लाक डाउन को जारी रखते हुए रियायतें बढ़ाने की रणनीति पर अमल कर रही हैं | लाक डाउन के दुष्परिणाम भी प्रवासी मजदूरों के पलायन के रूप में सामने आ रहे हैं जिसे हम चाहकर भी नहीं रोक पा. रहे हैं | सरकार यह तो चाहती है कि धीरे धीरे जनजीवन सामान्य होने लगे इसीलिए कि चरण बद्ध तरीके से रियायतें भी बढ़ाई जा रही हैं परंतु जब अचानक किसी राज्य में अथवा किसी इलाके में कोरोना संक्रमण के मामले एका एक बढ़ जाते हैं तो सरकार को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना करना पड़ता है| गौरतलब है कि रेल मंत्रालय ने 12 मई से मेल और एक्सप्रेस ट्रेन पुन:शुरू करने की घोषणा की थी और उनकी टिकट बुकिंग का कार्यक्रम भी घोषित कर दिया था परंतु इस घोषणा के अगले ही दिन केंद्र सरकार ने 30.जून तक इन रेल गाडियों को स्थगित रखने की घोषणा कर दी | इसका एक मात्र कारण यही माना जा सकता है कि सरकार भी जून और जुलाई में कोरोना संक्रमण चरम पर पहुंचने की चेतावनी को गंभीरता से ले रही है |इसीलिए उसने मेल और एक्सप्रेस ट्रेन को 30जून तक स्थगित रखने का फैसला किया |

वैसे यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि रेल मंत्रालय ने उक्त घोषणा करने के पूर्व सरकार से दिशा निर्देश प्राप्त करना आवश्यक क्यों नहीं समझा |इससे जनता में यह धारणा बनना स्वाभाविक है कि भयावह कोरोना संकट के समय भी सरकार के विभिन्न विभागों में पूर्ण समन्वय नहीं है |वास्तविकता चाहे जो हो परंतु जिस तरह दुनिया के बाकी देशों के समान हमारे देश में भी कोरोना संक्रमण की स्थिति भयावह बनी हुई है उसे देखते हुए अभी तो लाक डाउन को जारी रखने के अलावा और दूसरा रास्ता नहीं है |आज से कुछ समय पहले तक यह कहा जा रहा था कि बुरा वक्त बीत चुका है परंतु आज की तारीख़ में देश में कोरोना वायरस केसंक्रमण की रफ्तार को देख कर कोई यह नहीं कह सकता कि बुरा वक्त सचमुच ही बीत चुका है | विगत दिनो नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ गुलेरिया ने यह आशंका जताई है कि जून और जुलाई में कोरोना संक्रमण अपने चरम पर होगा |दरअसल यह आशंका अपने आप में एक चेतावनी भी है कि कोरोना संक्रमण अगर आगे आने वाले समय में और भी उस भयावह रूप में हमारे सामने आता है तो साहस के उसका सामना करने के लिए हमें खुद को अभी से मानसिक रूप से तैयार कर लेना चाहिए | प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल में राष्ट्र के नाम संबोधन में इसी आशय के विचार व्यक्त किए थे |

कोरोना के प्रकोप ने सभी देशों को यह स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया है कि जब तक वैज्ञानिकों को कोरोना की वैक्सीन तैयार करने में सफलता नहीं मिल जाती तब तक इस वायरस के संक्रमण को रोक पाना मुश्किल है | हम कोरोना वायरस की चेन को तो नहीं तोड़ पा रहे हैं परंतु हम ज्यादा से ज्यादा कोरोना संक्रमितों को स्वस्थ बनाकर लोगों के मन में यह विश्वास अवश्य पैदा कर सकते हैं कि कोरोना से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है |यह संतोष का विषय है कि कोविड -19 को मात देकर प्रसन्न मुद्रा में अस्पताल से घर लौटने वाले लोगों की संख्या में अब निरंतर वृद्धि हो रही है |जब कोई कोरोना संक्रमित व्यक्ति स्वस्थ होकर घर लौटता है तो उससे दूसरे कोरोना संक्रमितों के मन में यहविश्वास पैदा होता है कि कोवि्ड-19असाध्य बीमारी नहीं है |अब जब कि हम इस कड़वी हकीकत से अच्छी तरह वाकिफ हो चुके हैं कि हमें कोरोना को जीवन का हिस्सा मानकर आगे बढ़ना है तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी जीवन शैली में उन बदलावों को अपनाने में कोई कोताही न बरतें जो हमें कोरोना संक्रमण से अपनी सुरक्षा करने मे सहायक सिद्ध हो रही हैं |

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