मध्यप्रदेश : छात्राओं के लिए बनाया लाखों का भवन 3 साल से खा रहा धूल

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जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में जबलपुर के आस पास के जिलों से आकर पढ़ाई करने वाली छात्राओं को आवासीय सुविधा मुहैया कराने के लिए नया कन्या छात्रावास तीन साल पहले ही बन कर तैयार हो चुका है। लेकिन अभी तक छात्राओं को उक्त छात्रावास की सौगात नहीं मिली है। ऐसे में आज भी बाहर से आनेवाली छात्राओं को या तो रोजाना अपडाउन करना पड़ता है या फिर उन्हें महंगे दाम चुका कर किराए से मकान लेकर रहना पड़ता है।

समाचार भारती से हुई चर्चा में छात्र नेता सोमदत्त यादव ने बताया कि रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में मंडला, डिंडोरी, नरसिंहपुर और कटनी जिले से छात्राएं आकर पढ़ाई करती है। कुछ छात्राएं ऐसी है जो जबलपुर के दूर दराज क्षेत्र में निवास करती है। ऐसे में उन्हें प्रतिदिन की आवाजाही करना मुश्किल होता है। इस कारण अधिकतर छात्राएं शहर में रूम या मकान किराए से लेकर रहती है। जो काफी महंगा पड़ता है। लेकिन छात्राओं को छात्रावास में आवासीय सुविधा का लाभ नहीं मिल रहा है। जबकि छात्रावास 2017 में ही बन कर तैयार हो चुका था। ऐसे में दो साल बाद भी छात्राएं किराए के मकानों में रहने को मजबूर हैं। वर्तमान में विश्वविद्यालय में स्थित पुराने महिला छात्रावास में नवीनीकरण का काम चल रहा है।

रादुविवि छात्रसंघ की सचिव कल्पना पटेल ने सौपा ज्ञापन

वहीं दूसरी ओर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के छात्रसंघ की सचिव कल्पना पटेल के नेतृत्व में कस्तूरबा छात्रावास की छात्राओं ने सोमवार को कुलपति कपिल देव मिश्र के नाम ज्ञापन सौंपकर यह मांग की है कि छात्राओं की संख्या बढ़ने तथा पुराने छात्रावास के नवीनकारण के कारण छात्राओं की रहने में असुविधा हो रही है इसलिए नए छात्रावास को खोलकर रहने की सुविधा दी जाए। साथ ही छात्राओं ने छात्रावास में सफाईकर्मी न होने पर भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।

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निर्माण के समय से ही विवादों में रहा यह छात्रावास

जानकारी के मुताबिक ग्वारहवीं योजना के तहत यूजीसी ने महिला छात्रावास के लिए रादुविवि को 50 लाख रूपए अनुदान दिया था। वर्ष 2016 में जांच के दौरान यूजीसी ने पाया था कि रादुविवि द्वारा अनुदान राशि का जो उपयोगिता (यूटीलाइजेशन) प्रमाण पत्र यूजीसी को भेजा है वह तथ्यों से परे कूटरचित दस्तावेजों पर आधारित था। लिहाजा यूजीसी ने इस मामले को घोर लापरवाही और आर्थिक अनियमितता मानते हुए रादुविवि से अनुदान राशि वापस करने के साथ ही मामले में दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।

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जिसके बाद यूजीसी के निर्देश पर डॉ. डीएस गुप्ता ( प्रो. होम सांइस कॉलेज), एके सिंघई (एसो. प्रोफेसर सिविल इंजीनियरिंग कॉलेज) एवं वित्त नियंत्रक आरडीयू की सदस्यता वाली जांच कमेटी का गठन किया गया था। कमेटी ने जांच में सभी बिंदुओं को सही पाया था। वहीं कमेटी ने तत्कालीन कुल सचिव डॉ. मगन सिंह अवास्या और रादुविवि के यंत्री विनोद जरोलिया को पूरे प्रकरण में दोषी पाया था।

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