जिन गरीबों को टीवी पर लाकर पीएम ने अपनी पीठ थपथपाई, आज भी काम के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं

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के संतोष ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते 26 जून को गरीब कल्याण रोजगार अभियान के तहत आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश रोजगार कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए जिन छह लोगों से सीधा संवाद किया, उनकी कथा वह नहीं है, जो टीवी पर दिखी। असल सच्चाई यह है कि इन लोगों को भारी दुश्वारियों से जूझना पड़ रहा है।

सिद्धार्थनगर के डीएम और सांसद जगदंबिका पाल की मौजूदगी में कुरबान अली ने पीएम को बताया कि उन्हें और उनके भाई को गांव में सामुदायिक भवन के निर्माण में राजमिस्त्री का काम मिला है। प्रधान ने गांव में बनने वाले शौचालय और पीएम आवास के निर्माण में भी काम देने का भरोसा दिया है।

जबकि हकीकत यह है कि कुरबान अली ने गांव के सामुदायिक भवन में सिर्फ एक दिन काम किया और उसका भी उन्हें भुगतान नहीं मिला है। उन्होंने एक दिन ही सामुदायिक भवन के निर्माण में काम किया था कि प्रधान राजू खान ने पीएम से संवाद की बात बताई। कुरबान अली बताते हैं कि हालांकि, प्रधान ने भुगतान का भरोसा दिया है, पर यह नहीं बताया है कि कब और कितना मिलेगा।

इसी तरह कार्यक्रम के दौरान गोरखपुर के सहजनवा तहसील के प्रवासी मजदूर नागेन्द्र से भी पीएम की बात हुई। वह अहमदाबाद से लौटे हैं। इस पर पीएम ने कहाः आप योगी जी के गांव के हो और मेरे गांव में रहते थे। नागेन्द्र ने पीएम को बताया कि बैंक ऑफ बड़ौदा से एक लाख रुपये लोन लेकर डेयरी खोला है। सात लीटर दूध बेचकर रोज 365 रुपये रुपये की कमाई हो जाती है।

बकौल “नागेन्द्र, 55 हजार रुपये की एक भैंस खरीदी है। छह लीटर दूध बेचकर शेष घर के लिए रख लेता हूं। 45 रुपये प्रति लीटर की दर से दूध बिकता है, जिससे 270 रुपये मिलते हैं। भैंस की खुराकी पर खर्च काफी अधिक है। दो बोरा चोकर 2,200 रुपये में और 3,600 रुपये देकर दो ट्राॅली भूसा खरीदा है। हरा चारा खेतों से काट कर लाता हूं। अभी तो एक दिन की सामान्य मजदूरी के बराबर भी आय नहीं हो रही है।”

बहराइच के तिलकराम ने पीएम को बातचीत में बताया कि अभी तक झोपड़ी में रहते थे। पीएम आवास योजना के तहत पक्का मकान बन रहा है। अब बारिश में भीगना नहीं पड़ेगा। लेकिन पीएम के वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग के बाद तिलक को लेकर ब्लाॅक से लेकर ग्राम प्रधान तक परेशान हैं। तिलक का कहना है कि पीएम आवास के लिए उन्हें 1.20 लाख रुपये की मदद मिली थी। लॉकडाउन के पहले दीवार तो बन गई, लेकिन लेकिन छत नहीं लग सकी।

तिलकराम कहते हैं कि लॉकडाउन के पहले मजदूरी करते थे। सरकार से मिली मदद और खुद की कमाई के भरोसे निर्माणाधीन मकान की दीवार खड़ी हो गई। लेकिन लॉकडाउन के बाद काम ठप हो गया। लॉकडाउन में काम घटा तो घर में जो 20-25 हजार रुपये थे, वे पेट भरने में खर्च हो गए। अब अधिकारी मदद को तैयार नहीं हैं। ब्लाॅक के अधिकारी फटकार रहे हैं कि प्रधानमंत्री से बात कर लिए, तो मंत्री हो गए क्या? तिलकराम अब पूरे गांव की वीडियो बना रहे हैं। वह कहते हैं कि इसे लेकर वह लखनऊ में बैठेंगे और अधिकारियों की पोल खोलकर रहेंगे।

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