शहीदों की सहादत और खोया वजूद, राजनीति के चश्मे से बदरंग दिखती दुनिया..

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मनीष गुप्ता-
(समूह संपादक)

“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस लगेंगे मेले,वतन पर मर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा”। जब ये शायरी देश वासियों के अन्दर जोश भरने और शहीदों की सहादत को याद रखने के लिए लिखी गई होगी तो शायद यह नही सोचा गया होगा की आज के समय में ये प्रसंग धीरे-धीरे अपना वजूद खोता चला जायेगा। अपने लेख की शुरुआत मैंने इसलिए इस बिंदु से की है, क्यूंकि आज राजनीती यानि राज करने वाली नीति के आगे भारत माँ के सपूतों की आत्मा कचोट के रह जाती होगी। तमाम पार्टियाँ अपने महापुरुषों की याद में तमाम स्मारकों, सरकारी बिल्डिंग्स, एअरपोर्ट्स के नाम रखती है।


खास तौर पर उत्तर प्रदेश में अपनी अपनी पार्टियों के दिग्गजों और महापुरुषों के नाम पर। लेकिन ये महापुरुष जिन्हें पूरा देश जनता है, उन्हें मानता है की उन्होंने तमाम आंदोलनों में हिस्सा लिया, आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया और अपनी पार्टी के लिए दिन रात काम किया। उनके नाम पर संस्थानों के नाम रखना बहुत अच्छा कदम है। पर अगर यह सभी महापुरुष है तो सवाल यह है कि, सरहद पर दुश्मन की गोलियों से सीना छलनी करवा कर अपने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर देने वालों को क्या कहा जाना चाहिए? जवाब होगा कि राजनीति के चश्मे से दुनिया कुछ बदरंग दिखती है।


रमाबाई अंबेडकर मैदान, कांशीराम रैली स्थल, अंबेडकर मैदान, लोहिया पार्क, जनेश्वर मिश्र पार्क, इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट, अटल बिहारी बाजपेई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, अब शायद प्रस्तावित अटल बिहारी वाजपेई प्राणी उद्यान तमाम ऐसे उदाहरण है। लेकिन इनके सामने हमें शायद सिर्फ लखनऊ का गोमती नगर स्थित शहीद कैप्टन मनोज पांडे चौराहा ही याद होगा जहां पर 15 अगस्त को शहीदों की सहादत को याद कर राजनीति चमकाई जाती है। या फिर उनके घर वालों को रसोई गैस डिपो, या फिर पेट्रोल पंप आवंटन के रूप में इज्ज़त दी जाती है। क्या आपको नहीं लगता उत्तर प्रदेश के शहीदों के नाम से अस्पताल या फिर परमवीर चक्र विजेता गंजू लांबा के नाम से एयरपोर्ट बने?

लखनऊ का चिड़ियाघर या कुछ और सरकारी इमारतों के नाम इन शहीदों के नाम पर होते तो आज हमे अपनी यादाश्त पर ज्यादा जोर डाल कर इन्हें याद करना ना पड़ता। लेकिन राजनीती का चश्मा है जिसमे हर जगह राजनीति ही दिखती है, और दुश्मन से लोहा लेने वाले गोरखपुर के महेंद्र नाथ की शहादत या फिर मुलायम सिंह के संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ के मोहम्मद उस्मान की कुर्बानी याद रखने के लिए जनता को अपने दिमाग पर जोर डालना पड़ता है। जवाब यही आएगा जो मेरी स्क्रिप्ट की शुरुआत थी, की शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मर मिटने वालों की यही बाकी———- होगा?

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