भ्रष्ट नौकरशाहों पर क्यों मेहरबान है सरकार! EOW और लोकायुक्त में अटके 348 केस

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भोपाल। मध्य प्रदेश में जांच एजेंसियां अफसरों के ख़िलाफ अदालती कार्रवाई के इंतज़ार में बैठी हैं. इन अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ सरकार की मंज़ूरी मिलने के बाद के ही जांच एजेंसी अदालत जा पाएंगी. लेकिन सरकार ने अभी तक इजाज़त नहीं दी है. ऐसे एक या दो नहीं बल्कि 348 केस पेंडिंग पड़े हुए हैं.
मंज़ूरी का इंतज़ार– लोकायुक्त और EOW प्रदेश के भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाई चाहती है. दोनों एजेंसियों ने 348 नौकरशाहों के खिलाफ  अभियोजन स्वीकृति के लिए भेजे हैं.लेकिन वो तभी अपनी कार्रवाई आगे बढ़ा सकती है जब सरकार उसे परमिशन दे. लोकायुक्त की विशेष स्थापना पुलिस ने शासन को ऐसे 309 अफसरों की सूची सौंपी है. सूची में आईएएस रमेश थेटे, राज्य प्रशासनिक सेवा के विवेक सिंह, सहकारिता के संयुक्त पंजीयक बीएस चौहान, उप पंजीयक बीएस चौहान, उप पंजीयक अशोक मिश्रा शामिल हैं.

ये हैं अफसर-रमेश थेटे पर दर्ज मामलों की जांच 2015 में पूरी कर ली गई थी, लेकिन सरकार की तरफ से अभियोजन की स्वीकृति आज तक नहीं मिल सकी है.वहीं सेवानिवृत्त कलेक्टर अखिलेश श्रीवास्तव, अपर कलेक्टर शिवपाल सिंह, राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मनोज माथुर के मामले में 2014 से लोकायुक्त को स्वीकृति का इंतजार है.
ईओडब्ल्यू ने 39 मामलों की सूची शासन को सौंपी है. उसकी सूची में पूर्व आईएएस अंजू सिंह बघेल, पूर्व एसएएस प्रकाश चंद्र गुप्ता, सहकारिता मंत्री के ओएसडी अरविंद सेंगर के नाम शामिल हैं.कटनी के 2011 के एक मामले में तत्कालीन कलेक्टर अंजू सिंह बघेल के खिलाफ सामान्य प्रशासन विभाग को अभियोजन स्वीकृति का प्रस्ताव भेजा गया है.अंजू सिंह बघेल रिटायर हो गईं हैं, लेकिन अभी तक अभियोजन की स्वीकृति नहीं मिल सकी है.लंबित मामलों में छह से ज्यादा ऐसे मामले हैं, जिसमें कुछ अधिकारियों के खिलाफ 2 से लेकर 24 तक प्रकरण हैं.
इन 348 भ्रष्ट अफसरों के  लिए सरकार ने हाल ही में पांच मंत्रियों की उच्चस्तरीय समिति बनाई है.लेकिन इस समिति की अभी तक एक भी बैठक नहीं हो सकी है.सरकार की अनुमति नहीं मिलने की वजह से अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ अदालत में कार्रवाई नहीं हो पा रही है.

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