मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018: चुनाव की घोषणा से पहले सबसे सटीक विश्लेषण

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By – पूर्णेन्दु शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल

नई दिल्ली। चुनाव से ठीक पहले तीन प्रमुख राज्यों, मध्यप्रदेश, छत्तीगढ़ और राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। ये तीनों राज्य राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इन चुनावों को लोकसभा चुनाव के पूर्वाभ्यास के रूप में देखा जा रहा है। इन तीनों राज्यों में चुनाव जीतना भाजपा के लिए अपरिहार्य है, क्योंकि इनके नतीजों का सीधा असर 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर होगा। इन तीनों या इनमें से एक भी राज्य में यदि भाजपा की पराजय हुई, तो इसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर होगा। इन तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव दिसंबर में संभावित हैं।

राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं ये चुनाव

कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी अभी तक अपनी पार्टी को एक भी चुनाव में कामयाबी नहीं दिला पाए हैं। इसलिए इनमें से किसी भी राज्य की जीत को राहुल गांधी के नेतृत्व की विजय माना जाएगा। इसका लाभ उन्हें मिलेगा। कांग्रेस पार्टी में उनका नेतृत्व स्थापित होगा और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पूरी ताकत से उतरेगी। इसलिए इन तीनों राज्यों की सत्ता बरकरार रखने की चुनौती भाजपा के सामने है। अभी तक गुजरात को छोड़कर जितने भी राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, उनमें से अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थी। इसलिए इन राज्यों की सत्ता विरोधी लहर का झटका कांग्रेस को लगना स्वाभाविक था, जिसका लाभ भाजपा को मिला। इन तीनों राज्यों में भाजपा की सत्ता हैं इसलिए सत्ता विरोधी लहर का झटका भाजपा को लगने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राज्य में गरमाई राजनीति

मध्यप्रदेश में चुनावी हवा बहने लगी है। साल के आख़िर में मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसी के मद्देनज़र राज्य की राजनीति भी तेज़ हो गई है। विपक्ष के हमले बढ़ गए हैं तो मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान अपनी आशीर्वाद यात्रा में रोजाना नई-नई घोषणाएं कर रहे हैं। सरकार ने जैसे पिटारा खोल दिया है। कांग्रेस कह रही है कि हार के डर से घबराहट में सरकार ये ऐलान कर रही है।

शिवराज की छवि को भुनाएगी बीजेपी

मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बसपा के संभावित गठबंधन का मुकाबला करने के लिए भाजपा ने चुनाव की जंगी तैयारी की है। अपने पंद्रह वर्ष के शासनकाल में शिवराजसिंह द्वारा किए गए विकासकार्य भाजपा के पक्ष में एक बड़ी उपलब्धि है। उनकी छवि भी अच्छी है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मध्यप्रदेश के दौरे शुरू कर भाजपा की चुनावी मशीनरी को चाक-चौबंद किया है। अमित शाह का कहना है कि सत्ता विरोधी लहर भाजपा के लिए मुद्दा नहीं बन सकती, यह मुद्दा तो कांग्रेस के लिए हो सकता है। कार्यकर्ताओं में जोश पैदा करने के लिए पार्टी अध्यक्ष का इस तरह का भाषण जरूरी हो सकता है लेकिन इस तरह का अति आत्मविश्वास खतरनाक भी साबित हो सकता है।

ये मुद्दे बढ़ा सकते हैं बीजेपी की परेशानी

मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराजसिंह ने राज्य में खेती के विकास पर जोर दिया था, लेकिन अब वही खेती उनकी परेशानियां बढ़ा रही हैं। कपास, सोयाबीन और प्याज के उत्पादक किसानों के आंदोलन सरकार का सिरदर्द बढ़ा रहे हैं। भावंतर योजना मध्यप्रदेश की देश को एक देन है। इस योजना के तहत समर्थन मूल्य और बाजार के मूल्य में जो अंतर होता है, उसका भुगतान किसानों को सरकार करती है। हालांकि इसके लिए सरकार के पास पैसा नहीं है। पिछले वर्ष मंदसौर में किसानों के आंदोलन के दौरान हुई हिंसा में छह किसानों की मौत हुई थी। इस घटना की गूंज अभी तक कायम है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह की तरह भाजपा में भी कई वाचाल वीर हैं। इन वीरों ने भी भाजपा की दिक्कतें बढ़ाई हैं। व्यापम घोटाले का भूत भी सरकार की गर्दन से उतरने के लिए तैयार नहीं है। अभी तक इस कांड की जांच पूरी नहीं हुई। इस दौरान अनेक संदिग्ध व्यक्तियों और गवाहों की मौत हो चुकी हैं। कानून और व्यवस्था के मोर्चे पर भी शिवराज सरकार बैकपुट पर है। एक दशक से भी अधिक लंबे समय से महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में राज्य पहले स्थान पर बना हुआ है। बच्चों से होने वाले यौन अपराधों के मामले में भी मप्र शीर्ष पर हैं। इन तमाम प्रतिकूल कारकों के बावजूद आरएसएस के मजबूत नेटवर्क और पार्टी की मैदानी सक्रियता के बलबूते पर भाजपा लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही हैं।

कांग्रेस बना रही खास रणनीति

कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ नेता कमलनाथ को प्रदेशाध्यक्ष पद सौंपा और युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया। कांग्रेस बसपा के साथ गठबंधन करना चाहती है। इस दृष्टि से कमलनाथ की बसपा सुप्रीमो मायावती से चर्चा चल रही है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बसपा का गठबंधन हुआ तो वह भाजपा को भारी पड़ सकता है। पिछले चुनाव में भाजपा को मिले 44.85 प्रतिशत मतों के मुकाबले कांग्रेस को 36.38 और बसपा को 6.29 प्रतिशत वोट मिले थे । बसपा के अतिरिक्त कांग्रेस सपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के साथ भी तालमेल कर सकती है। पिछले चुनाव में बसपा ने चार सीटों पर जीत दर्ज की थी। इनमें 12-13 सीटें ऐसी थीं जहां बसपा मामूली अंतर से ही पीछे रही। इनके अलावा सीधी, सिंगरौली, कोलारस, श्योपुर, अशोकनगर, भिंड, ग्वालियर ग्रामीण, दतिया, रीवा, सतना, छतरपुर और टीकमगढ़ जिले की सीटों पर बसपा नतीजे प्रभावित करने की स्थिति बना चुकी है। सपा का भी प्रदेश के उत्तरी सीमावर्ती जिलों में प्रभाव है जबकि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी महाकौशल क्षेत्र के आदिवासी हलकों में खासी पैठ रखती है।

कांग्रेस-BSP के गठबंधन की संभावना, क्या बढ़ेगी बीजेपी की मुश्किल

कांग्रेस और बसपा का गठबंधन हो भी गया तो भी कांग्रेस को असली खतरा खुद कांग्रेस से ही है। कांग्रेस, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य और दिग्विजयसिंह के गुटों में बंटी है। इनके अलावा भी कई छोटे-बड़े गुट हैं। इसी गुटबाजी के चलते कांग्रेस मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा पेश नहीं कर पाई। राहुल गांधी, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया दोनों को ही बराबरी पर रखकर चल रहे हैं । दोनों ही मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। कमलनाथ वर्ष 1993 में भी राज्य के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। लेकिन, उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहाराव ने उन्हें केन्द्र सरकार में ही बने रहने के लिए कहा था। दिग्विजय सिंह राज्य के मुख्यमंत्री बन गए थे। दिग्विजय सिंह दस साल राज्य के मुख्यमंत्री रहे। वर्ष 2003 से कांग्रेस सत्ता से बाहर चल रही है। कमलनाथ ने इन पंद्रह सालों में कई बार राज्य कांग्रेस की कमान संभालने की इच्छा जाहिर की लेकिन पार्टी नेतृत्व तैयार नहीं हुआ। पहली बार कमलाथ प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हुए हैं। बताया जाता है कि कमलनाथ के दबाव में ही राहुल गांधी ने राज्य में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया। पार्टी कमलनाथ को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर चुनाव में कोई खतरा नहीं उठाना चाहती। पार्टी को अंदेशा है कि यदि एक चेहरे को आगे कर चुनाव लड़ा गया तो पार्टी की हार तय है। कमलनाथ के सामने सबसे बड़ी चुनौती गांव-गांव में कांग्रेस का संगठन खड़ा करने की है। मैदानी स्तर पर संगठन कमजोर होने के कारण वह प्रचार अभियान भी शुरू नहीं कर पा रहे हैं।

कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संभाला मोर्चा

राज्य में ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के ऐसे अकेले नेता हैं, जिनकी सभाओं में भीड़ आ जाती है। वे युवा है और अच्छे वक्ता भी। उनका चेहरा भारतीय जनता पार्टी की चिंता भी बढ़ा देता है। राज्य के ज्यादतर छोटे कार्यकर्ताओं की मांग सिंधिया को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने की है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से अपने आपको दूर रखा है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि यह मेरी मर्जी है कि मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहता। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें विभिन्न गुटों के नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी है। दिग्विजय सिंह एक दर्जन से अधिक जिलों का दौरा कर चुके हैं। वे कांग्रेसियों को एक करने के लिए उन्हें अन्न-जल की कसम भी दिला रहे हैं।

 

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