यूपी और बिहार में राष्ट्रवाद और विकास का मुद्दा रहा हावी, जात-पात भूल गए मतदाता, पढ़िए कैसे

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नई दिल्ली। देश को दो प्रमुख प्रदेश बिहार और यूपी जात-पात और धर्म की राजनीति के लिए जाने जाते है। इस बार के लोकसभा चुनाव के परिणामों में इन दोनों राज्यों में इस नीति का अंत होता दिख रहा है। 2019 लोकसभा चुनाव में ये दोनों ही चीजें गौण नजर आई है। इन दोनों राज्यों में जिस तरह से भाजपा के नेताओं ने जीत हासिल की उससे तो यही लगता है। चुनावी पंडित ये मान रहे हैं कि यूपी और बिहार से जो रिजल्ट मिले है उससे लगता है कि अब मतदाता जातगत राजनीति से ऊपर उठकर देश के विकास और राष्ट्रवाद पर वोट कर रहे हैं।

यूपी की 80 में से 63 और बिहार की 40 में से 37 सीटों पर भाजपा के जीतने के अनुमान ने ये साबित कर दिया कि इस बार का चुनाव बीजेपी ने सिर्फ विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ा जबकि ये दोनों दल पुराने जात-पात और धर्म के मुद्दे पर ही बने रहे। इसी का इनको नुकसान हुआ। इसके अलावा राष्ट्रवाद और विकास के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के सहारे मैदान में उतरने की भाजपा की चुनावी रणनीति सफल साबित हुई। मोदी के नेतृत्व में भाजपा और एनडीए को इस बार के चुनाव में ऐतिहासिक बहुमत मिलना लगभग तय माना जा रहा है।

आजाद भारत के इतिहास में कई मायने में यह चुनाव अहम माना जाएगा। न सिर्फ 2004 की तरह सत्ता विरोधी लहर की विपक्षी नेताओं की उम्मीदें ध्वस्त हो गईं, बल्कि इसके उल्टे भाजपा मोदी के पक्ष में सुनामी खड़ा करने में सफल रही। 6 महीने पहले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पराजय के बाद भाजपा के लिए 2019 की राह मुश्किल बताई जा रही थी।

यह भी कहा जा रहा था कि मौजूदा सांसदों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी के साथ-साथ विपक्षी दलों के गठबंधन की मार भाजपा पर भारी पड़ेगा। लेकिन बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद मोदी को केंद्रित करते हुए राष्ट्रवाद और विकास पर आधारित चुनावी रणनीति ने विपक्ष के गणित को पूरी तरह से फेल ही कर दिया।

मतगणना के बाद दो रूझान मिलने लगे उससे सभी चुनावी पंडितों के गणित गड़बड़ा गए। ‘मोदी है तो मुमकिन है’ के नारे में गरीबों के दरवाजे तक विकास की गाड़ी पहुंचाने के साथ-साथ दुश्मन के घर में घुसकर मारने वाली मोदी के छवि को मजबूत किया। बड़े नेताओं की लंबी कतार की बात करने वाली भाजपा ने बालाकोट के बाद पूरा चुनावी अभियान मोदी केंद्रित करने का फैसला किया।

यहां तक कि खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चुनावी पोस्टरों से अपना फोटो तक हटवा दिया। मोदी केंद्रित चुनाव अभियान कर भाजपा ने एक तीर से कई निशाना साधा। इससे मौजूदा सांसदों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी को खत्म किया गया। बल्कि इससे जातीय समीकरण को तोड़ने में भी सफलता मिली। यहां तक मोदी भी लगातार अपने चुनावी सभाओं में आडियो-विजुअल प्रचार में यह कहते रहे कि आपका वोट सीधे मोदी के खाते में जाएगा।

राष्ट्रवाद और विकास की लहर को मोदी की सुनामी में तब्दील करने में अमित शाह की अहम भूमिका रही। भाजपा को बहुमत दिलाने वाले अमित शाह ने जातीय समीकरणों पर भारी दिख रही सपा-बसपा गठबंधन की काट निकाली। सपा को सिर्फ यादवों और बसपा को जाटवों तक सीमित रखने में सफल रहे। उत्तर प्रदेश में गठबंधन से होने वाले घाटे को दूर करने में इन दोनों राज्यों की अहम भूमिका रही।

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